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अमेरिकी बाजार में और मजबूत होगी भारतीय दवाओं की पकड़ एक्सपर्ट


नई दिल्ली ।भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर जहां कई सेक्टरों में संशय और आशंकाएं बनी हुई हैं वहीं फार्मा सेक्टर को लेकर तस्वीर काफी सकारात्मक नजर आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस ट्रेड डील के बाद भारतीय फार्मा इंडस्ट्री की पकड़ अमेरिकी बाजार में और मजबूत होगी। कम लेबर कॉस्ट उन्नत निर्माण क्षमता और किफायती दवाओं के कारण भारत पहले से ही अमेरिका के लिए एक अहम फार्मा सप्लायर बना हुआ है और आने वाले समय में यह निर्भरता और गहरी हो सकती है।

जोटा हेल्थकेयर के चेयरमैन केतन जोटा ने इस विषय पर कहा कि अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा एफडीए अप्रूव्ड दवा निर्माण प्लांट भारत में स्थित हैं। यह अपने आप में भारतीय फार्मा सेक्टर की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को दर्शाता है। भारत से अमेरिका को बड़ी मात्रा में जेनरिक दवाएं लाइफ सेविंग मेडिसिन और क्रॉनिक बीमारियों की दवाएं निर्यात की जाती हैं। यही वजह है कि अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम में भारत की भूमिका बेहद अहम बन चुकी है।

केतन जोटा के अनुसार प्रस्तावित ट्रेड डील भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि मानी जा सकती है। उन्होंने कहा कि टैरिफ के मामलों में अमेरिका का रुख आमतौर पर सख्त रहा है और वह शायद ही कभी झुकता है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कूटनीतिक स्तर पर संतुलित और लाभकारी समझौता संभव हुआ है। यह डील दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है जिससे व्यापारिक संबंध और मजबूत होंगे।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत से अमेरिका को मुख्य रूप से लाइफस्टाइल और क्रॉनिक बीमारियों से जुड़ी दवाओं का निर्यात किया जाता है। इसमें डायबिटीज ब्लड प्रेशर थायराइड और अन्य लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों की दवाएं शामिल हैं। अमेरिकी बाजार में इन दवाओं की मांग लगातार बनी रहती है क्योंकि वहां स्वास्थ्य सेवाओं की लागत काफी अधिक है और भारतीय जेनरिक दवाएं किफायती विकल्प के रूप में देखी जाती हैं।

केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि यूरोपीय संघ के साथ हुई ट्रेड डील से भी भारतीय फार्मा सेक्टर को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। इस समझौते के तहत कई दवाओं के एक्सपोर्ट पर ड्यूटी को शून्य प्रतिशत कर दिया गया है। इससे भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाजार में और प्रतिस्पर्धी बनने का मौका मिलेगा। साथ ही इस डील से टेक्नोलॉजी और व्यापार का ट्रांसफर भी भारत में होगा जिससे दवा निर्माण प्रक्रिया और उन्नत होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सीधा असर भारत में दवा उत्पादन की लागत पर पड़ेगा। बड़े पैमाने पर उत्पादन और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से दवाओं की लागत और कम होगी। इसका फायदा केवल एक्सपोर्ट तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि घरेलू बाजार में भी मरीजों को सस्ती और प्रभावी दवाएं उपलब्ध हो सकेंगी।

इस तरह भारत अमेरिका ट्रेड डील और यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौते भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए नए अवसरों के द्वार खोल रहे हैं। इससे भारत की वैश्विक साख मजबूत होगी एक्सपोर्ट में इजाफा होगा और देश के भीतर हेल्थकेयर सिस्टम को भी मजबूती मिलेगी। फार्मा सेक्टर आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभर सकता है।

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