जगदीप का फिल्मी सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। बाल कलाकार के रूप में उन्होंने मात्र 3 रुपये की दिहाड़ी से शुरुआत की थी। देश विभाजन और गरीबी की त्रासदी को करीब से देख चुके इस बच्चे ने कभी सोचा भी नहीं था कि वे अभिनेता बनेंगे। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। 1951 में फिल्म ‘अफसाना’ की शूटिंग के दौरान मुख्य बाल कलाकार उर्दू संवाद नहीं बोल पाया, तब भीड़ का हिस्सा रहे जगदीप ने स्वयं वह संवाद बोल दिया। उनके इस हुनर से निर्देशक प्रभावित हुए और उन्हें 6 रुपये की दिहाड़ी पर काम करने का मौका मिला। यही उनके फिल्मी करियर की शुरुआत थी।
जगदीप का उच्चारण उर्दू में साफ और प्रभावशाली था। मात्र 9 वर्ष की उम्र में उन्होंने दरबार में राजा के आने से पहले होने वाली अनाउंसमेंट में शानदार प्रदर्शन किया। डायरेक्टर ने उन्हें तत्काल सेट पर बुलाकर पहला किरदार दिया और उस समय ही उन्होंने ठान लिया कि अब अभिनय ही उनकी जिंदगी है।
उनकी कॉमिक प्रतिभा का असली खुलासा तब हुआ जब निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें ‘धोबी डॉक्टर’ फिल्म में रोते हुए सीन में देखा। बिमल रॉय का मानना था कि जो पर्दे पर दूसरों को रुला सकता है, वही हास्य के माध्यम से गहराई दिखा सकता है। इसी वजह से उन्होंने जगदीप को फिल्म में बूट पॉलिश करने वाले लड़के का हास्यपूर्ण किरदार दिया। यह सीन जगदीप की जीवन और करियर में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
इसके बाद जगदीप ने ‘शोले’, ‘रोटी’, ‘एक बार कहो’ जैसी फिल्मों में कॉमेडी से भरपूर भूमिकाएं निभाईं। उनका हास्य कभी जादुई था, कभी भावुक। दर्शक उन्हें सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे, बल्कि उनकी अदायगी में छुपे जीवन अनुभव और संवेदनशीलता को भी महसूस करते थे। यही कारण है कि वे हिंदी सिनेमा में हास्य और चरित्र अभिनय का अविस्मरणीय नाम बने।
जगदीप की कहानी यह बताती है कि संघर्ष, प्रतिभा और सही दिशा मिल जाए तो कोई भी साधारण बच्चा बड़े पर्दे का सितारा बन सकता है। 6 रुपये की दिहाड़ी से शुरू हुआ सफर उन्हें ‘सूरमा भोपाली’ और हिंदी सिनेमा के चिरस्थायी हास्य कलाकार के रूप में ले गया। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल दर्शकों को हंसाया बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी दी।