देरी का सीधा असर न केवल विकास कार्यों पर पड़ा है, बल्कि इसका भारी वित्तीय बोझ भी सरकार पर पड़ा है। अब तक इन परियोजनाओं की लागत में करीब 1800 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं, सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस लापरवाही की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है।
इंदौर की त्रासदी: 33 मौतों ने खोली लापरवाही की पोल
प्रशासनिक ढिलाई का सबसे दर्दनाक उदाहरण इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में सामने आया, जहां दूषित पानी पीने से जनवरी-फरवरी 2026 के बीच 33 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग बीमार पड़ गए। बताया जाता है कि क्षेत्र में 30 साल पुरानी नर्मदा पाइपलाइन को बदलने की मांग लंबे समय से की जा रही थी, लेकिन संबंधित फाइलें महीनों तक अफसरों के पास अटकी रहीं।
करीब 550 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के टेंडर जारी करने में भी आठ महीने की देरी हुई। जब तक काम शुरू हुआ, तब तक स्थिति बिगड़ चुकी थी और लोगों की जान जा चुकी थी।
उज्जैन में जल आपूर्ति और सीवरेज प्रोजेक्ट भी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। यहां एक कंपनी की बैंक गारंटी जांच में फर्जी पाई गई, जिसके बाद उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। इससे परियोजना पूरी तरह ठप हो गई और हजारों कनेक्शन व सीवरेज लाइन का काम अटक गया।
डिजाइन और डीपीआर की खामियां बनी बड़ी वजह
सूत्रों के अनुसार कई प्रोजेक्ट्स की डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) समय पर तैयार नहीं हो सकी। डिजाइन और ड्रॉइंग में खामियों के चलते टेंडर और काम दोनों में देरी हुई। अब सरकार ने ऐसे सलाहकारों और ठेकेदारों की समीक्षा कर ब्लैकलिस्ट करने की तैयारी शुरू कर दी है।
बढ़ता वित्तीय बोझ: हर शहर पर करोड़ों का अतिरिक्त दबाव
देरी के कारण चारों शहरों में परियोजनाओं का बजट लगातार बढ़ रहा है-
* इंदौर: ₹800 करोड़ से बढ़कर ₹1073 करोड़
* भोपाल: ₹735 करोड़ में केवल 6% खर्च
* ग्वालियर: ₹932 करोड़ की परियोजना में वित्तीय अंतर
* जबलपुर: बढ़ी हुई लागत का बोझ नगर निगम पर
समाधान की कोशिश: ग्रीन बॉन्ड का सहारा
नगर निगम अब वित्तीय संकट से निपटने के लिए ग्रीन बॉन्ड और अन्य नगर निगम बॉन्ड जारी करने की योजना बना रहे हैं। इनका उपयोग जल, पर्यावरण और सीवरेज परियोजनाओं में किया जाएगा।
प्रशासनिक सख्ती की तैयारी
मुख्य सचिव स्तर पर हुई नाराजगी के बाद अब लापरवाह अफसरों और सलाहकारों पर कार्रवाई की तैयारी है। 13 जून को भोपाल में होने वाली बड़ी समीक्षा बैठक में सभी परियोजनाओं की प्रगति का आकलन किया जाएगा और जिम्मेदारी तय की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर निगरानी और निर्णय लिए जाते, तो न केवल वित्तीय नुकसान रोका जा सकता था, बल्कि कई जिंदगियां भी बचाई जा सकती थीं।