Harish
गाजियाबाद/दिल्ली। इच्छा मृत्यु के बाद बुधवार को हरीश राणा (Harish Rana) को अंतिम विदाई दी कई। ग्रीन पार्क (Green Park.) में सुबह नौ बसे उनका अंतिम संस्कार (Last rites) किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद और हरीश राणा को नमन किया।
भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia.) की अनुमति पाने वाले हरीश राणा पहले शख्स रहे। मंगलवार को उनका निधन हो गया था। वह पिछले 13 वर्षों से कोमा जैसी अवस्था में थे और इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पूरी की गई। हरीश के पिता अशोक राणा के करीबी मित्र दीपांशु मित्तल ने बताया कि हरीश का जीवन जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक संघर्ष भरा रहा। दिल्ली में जन्मे हरीश पढ़ाई के दौरान चंडीगढ़ में हादसे का शिकार हुए। बीते 13 वर्षों का उनका संघर्ष शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है।
कब क्या हुआ
-20 अगस्त 2013: हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल
-वर्ष 2022: माता-पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की
-8 जुलाई 2024: हाई कोर्ट ने इच्छामृत्यु याचिका खारिज की
-15 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
-11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी
-14 मार्च 2026: हरीश को एम्स, दिल्ली में भर्ती कराया गया
-24 मार्च 2026: एम्स में निधन

हर दिल में एक ही सवाल, क्या यही अंत था उस लंबी पीड़ा का
हरीश राणा के निधन ने राज एंपायर सोसायटी में ऐसा ही सन्नाटा छोड़ दिया है, जहां आंसू और राहत दोनों एक साथ महसूस किए जा रहे हैं। एक ओर एक युवा जीवन के चले जाने का गम है तो दूसरी ओर उस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति की राहत, जिसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं। मंगलवार को हरीश के निधन की खबर मिलते ही सोसायटी का माहौल बदल गया। हर घर में शोक की परछाई दिखाई दी और लोग एक-दूसरे से सवाल करते नजर आए कि आखिर यह संघर्ष इतने लंबे समय तक क्यों चला और क्या इसका अंत इसी रूप में होना तय था।
एक परिवार नहीं, पूरे समाज की पीड़ा
स्थानीय निवासी दीपांशु मित्तल ने कहा कि यह केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज की पीड़ा है। उनके अनुसार, हरीश के माता-पिता ने जो सहा है, उसे शब्दों में बयां करना संभव नहीं। एक अभिभावक होने के नाते वह इस दर्द को गहराई से महसूस करते हैं। उन्होंने कहा कि इस कठिन समय में पूरी सोसायटी परिवार के साथ खड़ी है।
पिता का संघर्ष एक योद्धा जैसा
सोसायटी में रहने वाले तेजस चतुर्वेदी ने इस घटना को असाधारण त्रासदी बताया। उन्होंने कहा कि किसी पिता का अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगना ही बताता है कि पीड़ा कितनी गहरी रही होगी। उनके अनुसार, अशोक राणा का संघर्ष किसी योद्धा से कम नहीं था, जो वर्षों तक अपने बेटे के लिए लड़ते रहे। उन्होंने कहा कि हरीश भले ही अब इस दुनिया में न हों, लेकिन उनकी कहानी लोगों के जेहन में लंबे समय तक जीवित रहेगी।
समर्पण की मिसाल बने पिता
सोसायटी निवासी सचिन शर्मा ने इसे एक पिता के समर्पण की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि हरीश के पिता ने अपने बेटे के लिए जो कुछ किया, वह असाधारण है। अंतिम समय तक उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और हर संभव प्रयास किया। उन्होंने यह भी कहा कि नवरात्र के दौरान हरीश का जाना इस घटना को और अधिक भावुक बना देता है।