सिंघार ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की सभा में शामिल न होने पर छिंदवाड़ा में अधिकारियों द्वारा कार्रवाई की चेतावनी देने वाले पत्र जारी किए गए। इसके अलावा उन्होंने लाड़ली बहना योजना की राशि न मिलने की धमकी भी देने का आरोप लगाया। सिंघार ने कहा कि जिन टेंडरों में कमीशन मिलता है, उनके लिए सरकार तुरंत पॉलिसी बना देती है, लेकिन गरीब और पीड़ित परिवारों के लिए कोई ठोस नीति नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार ऐसे मामलों के लिए कोई सिंगल विंडो सिस्टम बनाएगी ताकि जनता को लगातार विभागों के चक्कर नहीं काटने पड़ें।
एलपीजी गैस और व्यापारियों के मुद्दे पर भी सिंघार ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार ने एलपीजी गैस की अल्टरनेटिव पॉलिसी नहीं बताई और न ही यह स्पष्ट किया कि रिजर्व कितना है। इसके अलावा होटल व्यवसायियों और छोटे दुकानदारों के भविष्य और उनके व्यवसाय सुरक्षा को लेकर भी उन्होंने सरकार की नीति पर सवाल खड़ा किया।
सिंघार ने पिछले पांच वर्षों के आंकड़े पेश किए और बताया कि प्रदेश में 65 हजार से ज्यादा दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें 14,791 लोगों की मौत हुई। इस मामले में मध्यप्रदेश देश में दूसरे नंबर पर है। उनके अनुसार यह स्थिति सीधे तौर पर सरकार की विफलता को दर्शाती है।
नेता प्रतिपक्ष ने मध्यप्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री कर्ज लेने में माहिर हैं और प्रदेश को “EMI मॉडल” पर चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिछले दो दशकों में भाजपा सरकार ने विकास के नाम पर लाखों करोड़ का कर्ज लिया, लेकिन सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में हालात जस के तस हैं। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष खत्म होने तक चौथी बार 2,500 करोड़ का कर्ज लिया गया और इस साल कुल कर्ज 91,500 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। सिंघार ने सवाल उठाया कि क्या सरकार ने तय कर लिया है कि प्रदेश को कर्ज में डुबोकर ही छोड़ेगी।
सिंघार ने कहा कि जनता टैक्स पर टैक्स दे रही है, महंगाई झेल रही है, लेकिन सरकार बिना किसी रोडमैप और पारदर्शिता के कर्ज ले रही है। उन्होंने पूछा कि आखिर यह कर्ज किस योजना में लगा और इसका क्या परिणाम निकला। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार को इसका जवाब देना होगा।
सिंघार के अनुसार यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी है। उन्होंने प्रदेश सरकार को चेताया कि अब गरीबों और पीड़ित परिवारों के हितों को प्राथमिकता दी जाए और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।