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SC ने अनावश्यक मुकदमेबाजी पर केंद्र सरकार को लगाई फटकार, ठोका 25 हजार जुर्माना


नई दिल्ली।
केंद्र सरकार (Central Government) को अनावश्यक मुकदमेबाजी में पड़ने के लिए फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश केंद्र की उस याचिका पर दिया है जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट (Punjab and Haryana High Court) द्वारा एक सीआईएसएफ अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने सजा को असंगत पाते हुए अधिकारी को बकाया वेतन देने का भी आदेश दिया।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हमें समझ नहीं आ रहा कि भारत सरकार ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को चुनौती क्यों दी है। हम बातें सुनते हैं कि मामले लंबित हैं। आखिर सबसे बड़ा मुकदमेबाज कौन है? हर्जाना लगाया जाना चाहिए।” उन्होंने कहा, “ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि अगर उच्च न्यायालय ने इसे अनुचित पाया और सभी आदेशों को रद्द करते हुए राहत प्रदान की, तो हम उच्चतम न्यायालय न जाएं?” उन्होंने कहा कि अधिकारी ने चिकित्सा अवकाश लिया था, लेकिन उन्हें उनके परिवार में एक अप्रिय घटना से भी निपटना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) द्वारा आयोजित एक हालिया सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि मामलों के लंबित रहने के लिए सरकार जिम्मेदार है। इस बयान का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि अदालत ने एससीबीए सम्मेलन को बहुत गंभीरता से लिया है।

उन्होंने कहा, “यह सिर्फ किसी रिसॉर्ट में जाकर वापस आने की बात नहीं थी। हमने तैयारियां कीं, हमने पूरी जानकारी जुटाई। हमने बात की। महज इसलिये नहीं कि हम भूल जाएं।” सीआईएसएफ अधिकारी के खिलाफ दो आरोप लगाए गए थे – पहला 11 दिनों तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और दूसरा, एक महिला, जोकि एक सीआईएसएफ कांस्टेबल की बेटी थी, के साथ मिलकर मुंबई से भागने और अपने छोटे भाई के साथ उसकी शादी में शामिल होने की साजिश रचकर अनुशासनहीनता का कार्य करने का।


स्वीकृत चिकित्सा अवकाश पर थे अधिकारी

उच्च न्यायालय ने इस बात पर संज्ञान लिया कि 11 दिनों की अनुपस्थिति की अवधि के दौरान अधिकारी स्वीकृत चिकित्सा अवकाश पर थे। अदालत ने कहा, “प्रतिवादी-याचिकाकर्ता के भाई के साथ भाग जाने के दूसरे आरोप के संबंध में, यह रिकॉर्ड पर आया है कि महिला स्वयं अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान उपस्थित हुई और उसने कहा कि उसे प्रतिवादी-याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है।”

उच्च न्यायालय ने कहा, “यह बात निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता के भाई ने संबंधित महिला से विवाह किया था। अतः यह पाया गया है कि वास्तव में याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई कदाचार नहीं हुआ था जिसके लिए उसे सेवा से हटाया जा सके।”

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