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हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के मामलों में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाने पर ब्रेक अफसर करेंगे नाम विलोपन


भोपाल । मध्यप्रदेश में प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर एक अहम बदलाव की तैयारी शुरू हो गई है जहां बीते तीन महीनों में लगातार बढ़ते मामलों ने सरकार को नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है दरअसल हाल के आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विभिन्न निकायों से जुड़े मुकदमों में मुख्य सचिव को बार बार पक्षकार बनाया जा रहा है जिससे न केवल प्रशासनिक दबाव बढ़ रहा है बल्कि अनावश्यक कानूनी जटिलताएं भी उत्पन्न हो रही हैं

इसी स्थिति को देखते हुए अब अफसरों ने तय किया है कि ऐसे मामलों में मुख्य सचिव का नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी इसके तहत अपर मुख्य सचिव प्रमुख सचिव सचिव और कलेक्टर स्तर के अधिकारी संबंधित अदालतों में आवेदन प्रस्तुत कर मुख्य सचिव का नाम विलोपित कराने की पहल करेंगे इस कदम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मुख्य सचिव को सीधे तौर पर नोटिस जारी न हों और प्रशासनिक कार्यों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े

जानकारी के अनुसार वर्तमान में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में निकायों से जुड़े कई मामले विचाराधीन हैं जिनमें याचिकाकर्ताओं द्वारा मुख्य सचिव को भी पक्षकार बनाया गया है जबकि प्रशासन का मानना है कि मुख्य सचिव किसी एक विभाग के प्रभारी नहीं होते इसलिए उन्हें ऐसे मामलों में शामिल करना उचित नहीं है

सामान्य प्रशासन विभाग ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जहां भी मुख्य सचिव का नाम पक्षकार के रूप में जोड़ा गया है वहां उसे हटाने की कार्रवाई की जाए अधिकारियों का तर्क है कि इससे न केवल कानूनी प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और सुव्यवस्थित होगी बल्कि जिम्मेदारी भी सीधे संबंधित विभागों तक सीमित रहेगी

आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 में अब तक 38 मामलों में से 9 में मुख्य सचिव को रिसपोंडेंट बनाया गया है जबकि दो मामलों में उनके नाम से अवमानना के प्रकरण भी दर्ज हैं वहीं वर्ष 2025 में कुल 88 मामलों में से 15 में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाया गया था ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि समय के साथ यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है

इस पूरी कवायद को प्रशासनिक सुधार और जिम्मेदारियों के स्पष्ट निर्धारण के रूप में देखा जा रहा है माना जा रहा है कि यदि यह रणनीति सफल होती है तो भविष्य में उच्च स्तर के अधिकारियों को अनावश्यक कानूनी उलझनों से राहत मिलेगी और शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगी

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