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अलविदा कहने से पहले दे गए उजाला: इंदौर ने 14 हजार लोगों की जिंदगी में लौटाई रोशनी


मध्यप्रदेश। किसी व्यक्ति का जीवन भले ही समाप्त हो जाए, लेकिन उसका एक फैसला किसी दूसरे की दुनिया रोशन कर सकता है। इंदौर ने इसी सोच को जनआंदोलन में बदलकर पूरे प्रदेश के सामने एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है। नेत्रदान के क्षेत्र में मध्य प्रदेश का अग्रणी शहर बन चुके इंदौर में पिछले 12 वर्षों के दौरान 18 हजार से अधिक लोगों ने मृत्यु के बाद अपने नेत्र दान किए हैं। इन दानों की बदौलत 14 हजार से ज्यादा लोगों की अंधेरी दुनिया में फिर से उजाला लौट पाया है।

विश्व नेत्रदान दिवस के अवसर पर सामने आए आंकड़े बताते हैं कि शहर में नेत्रदान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में स्थिति यह है कि हर महीने 100 से अधिक परिवार अपने प्रियजनों की मृत्यु के बाद नेत्रदान का निर्णय लेकर मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। यह केवल चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और जागरूकता का भी प्रतीक है।

इंदौर में वर्तमान में संकरा आई बैंक, एमके इंटरनेशनल आई बैंक और चोइथराम आई बैंक सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। इनके साथ मुस्कान ग्रुप, दधीचि मिशन, गोल्ड क्वाइन सहित कई सामाजिक संस्थाएं भी लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित कर रही हैं। इन संगठनों की सतत कोशिशों ने शहर में नेत्रदान की संस्कृति को मजबूत आधार दिया है।

संकरा आई बैंक की विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में केवल उनके संस्थान को 2700 से अधिक कॉर्निया प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 1670 का सफल प्रत्यारोपण किया जा चुका है। कॉर्निया ट्रांसप्लांट की सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक रहती है, जो हजारों मरीजों के लिए नई उम्मीद लेकर आती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि नेत्रदान के बाद प्राप्त कॉर्निया का उपयोग सीधे नहीं किया जाता। पहले डोनर की एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी जैसी जरूरी जांचें की जाती हैं। सभी रिपोर्ट सामान्य आने के बाद ही प्रत्यारोपण की प्रक्रिया पूरी होती है।

कॉर्निया प्रत्यारोपण का लाभ बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी आयु वर्ग के मरीजों को मिल रहा है। जन्मजात कॉर्निया संबंधी समस्याएं, दुर्घटनाओं में आंखों की क्षति, आंखों में सफेदी आना या रासायनिक पदार्थों से दृष्टि प्रभावित होने जैसी स्थितियों में यह उपचार नई जिंदगी का आधार बनता है। कई मरीजों को एक आंख तो कई को दोनों आंखों में प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है।

इस अभियान की सफलता के पीछे कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने इसे अपना जीवन मिशन बना लिया है। इंदौर के 58 वर्षीय इलेक्ट्रॉनिक व्यवसायी जितेंद्र बगानी, जिन्हें लोग ‘जीतू ग्रेजुएट’ के नाम से जानते हैं, उनमें से एक हैं। मुस्कान संस्था से जुड़े बगानी अब तक 6 हजार से अधिक नेत्रदाताओं से कॉर्निया प्राप्त कर चुके हैं। विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वे वर्षों से दिन-रात इस सेवा कार्य में जुटे हैं। नेत्रदान की सूचना मिलते ही वे तुरंत मौके पर पहुंचते हैं और कुछ ही मिनटों में प्रक्रिया पूरी कर जरूरतमंदों तक रोशनी पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

इंदौर की यह सफलता बताती है कि जब समाज जागरूक और संवेदनशील होता है तो मृत्यु भी जीवन का संदेश बन जाती है। नेत्रदान केवल एक दान नहीं, बल्कि किसी की अंधेरी दुनिया में प्रकाश भरने का सबसे बड़ा माध्यम है। यही कारण है कि इंदौर आज नेत्रदान के क्षेत्र में पूरे देश के लिए एक प्रेरक मॉडल बनकर उभर रहा है।

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