सियोल में मीडिया से बातचीत के दौरान ग्रॉसी ने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम बेहद व्यापक और महत्वाकांक्षी है, इसलिए IAEA निरीक्षकों को पूर्ण पहुंच देना अनिवार्य होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि बिना ठोस और विस्तृत सत्यापन तंत्र के कोई भी समझौता टिकाऊ नहीं हो सकता।
परमाणु ठिकानों तक सीमित पहुंच पर चिंता
IAEA की एक पूर्व गोपनीय रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया संघर्ष के दौरान जिन परमाणु ठिकानों पर इजराइल और अमेरिका ने हमले किए थे, वहां तक एजेंसी को अब तक पूरी पहुंच नहीं मिल सकी है। ऐसे में यह पुष्टि करना मुश्किल है कि ईरान ने संवर्धन गतिविधियां रोकी हैं या नहीं, और उसके यूरेनियम भंडार की वास्तविक स्थिति क्या है।
IAEA के अनुसार, ईरान के पास 60% तक संवर्धित लगभग 440.9 किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है। ग्रॉसी ने चेताया कि यदि इसे हथियार बनाने की दिशा में उपयोग किया गया, तो यह मात्रा करीब 10 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त हो सकती है। हालांकि, ईरान लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता रहा है।
उत्तर कोरिया पर भी बढ़ती चिंता
ग्रॉसी ने उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने संकेत दिया कि वहां परमाणु गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं और योंगब्योन जैसे प्रमुख केंद्रों का विस्तार किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का भी मानना है कि 2019 में अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने के बाद उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु ढांचे को और मजबूत किया है।
अमेरिका-ईरान वार्ता पर असर संभव
यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ वार्ता का दूसरा दौर जल्द हो सकता है। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना अमेरिका की प्राथमिकता है।
हालांकि, हाल ही में पाकिस्तान में हुई दोनों देशों के बीच पहली वार्ता बेनतीजा रही। अमेरिकी पक्ष ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को मुख्य विवाद बताया, जबकि एक ईरानी अधिकारी ने इस दावे को खारिज किया।
IAEA की सख्त शर्तें यह साफ संकेत देती हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बिना ठोस निगरानी के कोई भी समझौता टिक नहीं पाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान वार्ता पर वैश्विक नजरें टिकी रहेंगी।