17 साल पुराने Malegaon Blast केस में सबूतों की कमी, कोर्ट ने आरोपियों को दी राहत—अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में असफल रहा ऐसे में संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपियों को बरी किया गया इस मामले की सुनवाई लंबे समय तक चली और कई बार जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे
यह घटना आठ सितंबर 2006 को हुई थी जब मालेगांव में सिलसिलेवार धमाके हुए थे इन धमाकों में करीब पैंतालीस लोगों की मौत हो गई थी जबकि सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे घटना के बाद पुलिस और अन्य एजेंसियों ने कई संदिग्धों को हिरासत में लिया और बाद में आरोपपत्र दाखिल किया गया हालांकि अदालत में पेश किए गए सबूत आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माने गए
2006 धमाके में 45 लोगों की गई थी जान, जांच पर उठे सवाल—फैसले के बाद एक बार फिर जांच प्रक्रिया पर बहस तेज हो गई है कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इतने लंबे समय के बाद भी पुख्ता सबूत नहीं जुटा पाना गंभीर सवाल खड़े करता है वहीं पीड़ित परिवारों के लिए यह फैसला निराशाजनक माना जा रहा है क्योंकि उन्हें न्याय की उम्मीद थी
इस निर्णय ने एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी पर ध्यान केंद्रित कर दिया है अब देखना होगा कि आगे इस मामले में कोई नई कानूनी पहल होती है या नहीं फिलहाल इस फैसले के साथ ही यह पुराना मामला एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है और देश भर में इस पर चर्चा जारी है