नई दिल्ली । दुनिया भर में छाई आर्थिक अनिश्चितता और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था एक सुरक्षित और मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में पैदा हुई बड़ी बाधाओं के बावजूद भारत की आंतरिक मजबूती इसके बचाव में सबसे बड़ी ढाल बनी हुई है। रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि देश की मजबूत घरेलू मांग, प्रभावी सरकारी निवेश और एक बेहद लचीली वित्तीय प्रणाली ने मिलकर अर्थव्यवस्था को एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जो बाहरी झटकों को सहने में पूरी तरह सक्षम है।
बाजार के वर्तमान आंकड़ों पर नजर डालें तो खपत का स्तर उम्मीद से कहीं बेहतर है। मार्च महीने के दौरान वाहनों और ट्रैक्टरों की खुदरा बिक्री में हुई बढ़ोतरी इस बात का प्रमाण है कि देश के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मांग का पहिया तेजी से घूम रहा है। हालांकि, समीक्षा में इस बात को लेकर आगाह भी किया गया है कि भविष्य की आर्थिक दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनपुट लागत और आपूर्ति श्रृंखला पर कितना दबाव रहता है। उम्मीद जताई गई है कि साल 2026 के उत्तरार्ध तक मध्य पूर्व की स्थितियों में सुधार देखने को मिल सकता है, जिससे वैश्विक व्यापार को राहत मिलेगी।
चुनौतियों के मोर्चे पर मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यदि पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसके राजकोषीय प्रभाव पड़ना तय है। इससे न केवल केंद्र बल्कि राज्यों की राजस्व प्राप्ति और खर्च करने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
ऊर्जा और उर्वरक की आपूर्ति में संभावित अनिश्चितता मुद्रास्फीति (महंगाई) और व्यापार घाटे को बढ़ा सकती है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का व्यापार घाटा पिछले वर्ष के मुकाबले बढ़कर 333.2 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, और यह प्रवृत्ति अगले वित्त वर्ष में भी जारी रहने की संभावना है। इसके बावजूद, सरकार ने ‘आर्थिक स्थिरीकरण कोष’ जैसी रणनीतियों के माध्यम से किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त राजकोषीय गुंजाइश बना रखी है।
आर्थिक विकास की इस गति को भविष्य में भी बनाए रखने के लिए सरकार अब नई तकनीकों और कौशल विकास पर दांव लगा रही है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और टिकाऊ व्यापार कौशल में निपुण बनाकर घरेलू विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।
इससे न केवल रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत के निर्यात की हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। कुल मिलाकर, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सावधानीपूर्ण नीतिगत फैसलों और आंतरिक मजबूती के दम पर भारत वैश्विक संकटों के बीच भी अपनी विकास दर को सुरक्षित रखने में कामयाब रहेगा।