ममता बनर्जी को उनके गढ़ में दी चुनौती
शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में खुद को उस नेता के रूप में स्थापित किया, जो सीधे ममता बनर्जी को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने नंदीग्राम सीट पर 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को हराया था। बाद में ममता को भवानीपुर सीट से चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को उसके मजबूत गढ़ में हराना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और इसी ने शुभेंदु को बीजेपी के लिए सबसे मजबूत विकल्प बना दिया।
बीजेपी के एजेंडे के लिए फिट चेहरा
विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी को बंगाल में ऐसा नेता चाहिए था, जो असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की तरह आक्रामक और संगठनात्मक रूप से मजबूत हो। पार्टी पहले ही यह संकेत दे चुकी थी कि बंगाल का मुख्यमंत्री ऐसा व्यक्ति होगा, जिसका राज्य से गहरा जुड़ाव हो। बीजेपी ने चुनावी घोषणापत्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने और बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी थी। ऐसे में शुभेंदु अधिकारी पार्टी की रणनीति के अनुरूप सबसे उपयुक्त चेहरे के तौर पर सामने आए।
प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव भी बना आधार
शुभेंदु अधिकारी को सरकार चलाने का अनुभव भी है। टीएमसी सरकार में वह मंत्री रह चुके हैं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को करीब से समझते हैं। बीजेपी नेताओं का मानना है कि नई सरकार बनने के बाद वे ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल को लेकर श्वेतपत्र जारी कर सकते हैं और विभिन्न मामलों की जांच के लिए आयोग भी गठित किया जा सकता है।
हिंदुत्व की छवि से RSS का समर्थन
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, शुभेंदु अधिकारी की हिंदुत्व समर्थक छवि भी उनके पक्ष में गई। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ उन्होंने खुलकर आवाज उठाई थी। नंदीग्राम क्षेत्र में उन्हें हिंदुत्व के मजबूत चेहरे के तौर पर पेश किया गया। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के भीतर भी उन्हें लेकर सकारात्मक रुख बताया जा रहा है।
छात्र राजनीति से बंगाल की सत्ता तक का सफर
शुभेंदु अधिकारी राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली नेता माने जाते थे। शुभेंदु ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस की छात्र इकाई से की थी। बाद में, जब बंगाल में वामपंथ का दबदबा था, तब उन्होंने ममता बनर्जी के साथ मिलकर टीएमसी को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई। पूर्व मेदिनीपुर में उन्होंने वाम दलों को कड़ी चुनौती दी। वर्ष 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और इसके बाद से वे पार्टी के सबसे प्रभावशाली बंगाली नेताओं में शामिल हो गए।