वन विभाग ने यह कदम तब उठाया है जब पड़ोसी कान्हा टाइगर रिजर्व में इसी वायरस के कारण पांच बाघों की मौत की पुष्टि हुई थी। इसके बाद पेंच प्रबंधन पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गया है, क्योंकि दोनों टाइगर रिजर्व के बीच वन्यजीव कॉरिडोर होने के कारण बाघों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।
पार्क प्रबंधन ने वन रक्षकों की मदद से बफर क्षेत्र के गांवों में सर्वे कराया, जिसमें सिवनी जिले के 80 और छिंदवाड़ा जिले के 40 गांव शामिल हैं। सर्वे में कुल 1560 आवारा कुत्तों की पहचान की गई है, जिन्हें अब चरणबद्ध तरीके से टीका लगाया जाएगा। हालांकि, अभी यह तय नहीं हो पाया है कि वैक्सीनेशन का काम कौन करेगा, लेकिन इसके लिए एनजीओ, पशु चिकित्सा विभाग और वाइल्डलाइफ हेल्थ संस्थानों से सहयोग लेने की योजना बनाई जा रही है।
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक अत्यंत संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से कुत्तों और अन्य मांसाहारी वन्यजीवों को प्रभावित करती है। यह बीमारी बाघ, तेंदुआ, लोमड़ी, भेड़िया और लकड़बग्घा जैसे जानवरों तक भी फैल सकती है। संक्रमित आवारा कुत्ते जंगल के आसपास घूमते हुए इस वायरस को वन्यजीवों तक पहुंचा देते हैं, जिससे बड़ी वन्यजीव क्षति का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी के लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, लगातार खांसी, उल्टी-दस्त, कमजोरी, शरीर कांपना और चलने में लड़खड़ाहट शामिल हैं। गंभीर स्थिति में यह जानलेवा साबित हो सकती है।
वन विभाग के सामने इस अभियान में बजट की चुनौती भी है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही वैक्सीनेशन कार्य शुरू कर दिया जाएगा। पेंच टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर पुनीत गोयल ने बताया कि योजना तैयार है और जल्द ही जमीनी स्तर पर काम शुरू होगा।
यह पहल न केवल बाघों की सुरक्षा के लिए अहम है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।