भाग्यश्री ने हाल ही में साझा किया कि फिल्म इंडस्ट्री में किसी कलाकार की फीस का निर्धारण केवल उसकी कला पर नहीं, बल्कि ‘सप्लाई और डिमांड’ यानी मांग और आपूर्ति के नियम पर आधारित होता है। उनके अनुसार, फिल्म निर्माण अंततः एक व्यवसाय है। जब वह इस फिल्म का हिस्सा बनीं, तब उनकी बाजार में स्थिति और निर्माता की जरूरतों ने उन्हें एक मजबूत मोलभाव करने की शक्ति दी थी। अभिनेत्री का तर्क है कि यदि किसी निर्माता को लगता है कि कोई विशिष्ट कलाकार ही उस भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ है और उसका कोई विकल्प मौजूद नहीं है, तो उसे उस कलाकार की शर्तों को मानना ही पड़ता है। यह पूरी तरह से एक बिजनेस स्ट्रैटेजी है जहां आपकी उपयोगिता ही आपकी कीमत तय करती है।
सिनेमा जगत में वेतन समानता यानी पे-पैरिटी के गंभीर मुद्दे पर बात करते हुए भाग्यश्री ने काफी यथार्थवादी रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि महिलाओं को इंडस्ट्री में तब तक उचित पारिश्रमिक नहीं मिल सकता जब तक वे अपनी मांगों को लेकर एकजुट नहीं होतीं। उन्होंने बाजार की अस्थिरता का जिक्र करते हुए कहा कि हमेशा कोई न कोई ऐसा कलाकार मौजूद रहता है जो कम कीमत पर काम करने या अपने काम की गुणवत्ता से समझौता करने को तैयार हो जाता है। ऐसे में जो कलाकार अपनी शर्तों पर अड़े रहते हैं, उन्हें कई बार चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उनके अनुसार, काम केवल धन के लिए नहीं बल्कि रचनात्मक संतुष्टि के लिए भी किया जाता है, लेकिन पेशेवर जगत में अपनी वैल्यू पहचानना अनिवार्य है।
भाग्यश्री द्वारा साझा किया गया यह अनुभव आज के दौर में भी प्रासंगिक है, जहां अक्सर पुरुष और महिला कलाकारों के बीच बढ़ते वेतन अंतर पर बहस होती रहती है। उस समय सलमान खान अपनी शुरुआती पारी खेल रहे थे और भाग्यश्री की यह पहली फिल्म थी, फिर भी एक अभिनेत्री का अभिनेता से चार गुना ज्यादा पैसा लेना उस दौर की स्थापित परंपराओं को तोड़ने जैसा था। फिल्म में ‘सुमन’ के उनके किरदार ने उन्हें रातों-रात लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया था। उनके द्वारा किया गया यह खुलासा यह समझने में मदद करता है कि फिल्म उद्योग में सितारों की चमक के पीछे जटिल व्यावसायिक निर्णय और मोलभाव की बड़ी भूमिका होती है।