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PM मोदी का करीबी बनकर करोड़ों की ठगी करने वाले आरोपी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, तीन साल जेल में बिताने के बाद मिली जमानत

नई दिल्ली में सामने आए एक चर्चित मनी लॉन्ड्रिंग और ठगी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी काशिफ को जमानत देकर बड़ी राहत प्रदान की है। आरोपी पर आरोप है कि उसने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई केंद्रीय मंत्रियों का करीबी बताकर लोगों को प्रभाव में लिया और सरकारी नौकरी, ठेके तथा सरकारी विभागों में मदद दिलाने के नाम पर लाखों रुपये की ठगी की। यह मामला लंबे समय से जांच एजेंसियों की निगरानी में था और आरोपी बीते लगभग तीन वर्षों से जेल में बंद था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी लंबी न्यायिक हिरासत को ध्यान में रखते हुए जमानत मंजूर की है।

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की जमानत याचिका पहले खारिज कर दी गई थी। अदालत ने माना कि आरोपी काफी लंबा समय जेल में गुजार चुका है और मामले की सुनवाई अभी जारी है। इसी आधार पर उसे सशर्त जमानत देने का फैसला लिया गया। हालांकि अदालत ने आरोपी को सख्त चेतावनी भी दी कि वह भविष्य में किसी भी संवैधानिक या सरकारी अधिकारी के नाम का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए नहीं करेगा।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है या जांच प्रक्रिया में सहयोग नहीं करता, तो प्रवर्तन निदेशालय उसकी जमानत रद्द कराने के लिए दोबारा अदालत का रुख कर सकता है। अदालत ने आरोपी को जांच और ट्रायल की हर प्रक्रिया में पूरा सहयोग देने का निर्देश दिया है।

यह मामला अप्रैल 2023 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा हुआ है, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत गंभीर आरोप लगाए गए थे। जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपी ने सोशल मीडिया पर अपनी कई एडिट और मॉर्फ की गई तस्वीरें साझा की थीं, जिनमें वह प्रधानमंत्री और कई बड़े नेताओं के साथ दिखाई दे रहा था। इन तस्वीरों के जरिए उसने लोगों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की कि उसकी पहुंच सत्ता के सबसे ऊंचे स्तर तक है।

जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने, बड़े सरकारी ठेके हासिल कराने और विभिन्न सरकारी विभागों में प्रभाव का इस्तेमाल कर काम करवाने का भरोसा देता था। इसके बदले वह लोगों से मोटी रकम वसूलता था। एजेंसियों का दावा है कि आरोपी ने अपनी फर्जी पहचान और प्रभाव का इस्तेमाल कर कई लोगों को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाया।

प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपी से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी भी की थी, जहां से लगभग 1.10 करोड़ रुपये से अधिक की रकम बरामद होने का दावा किया गया। जांच एजेंसी का कहना है कि यह रकम कथित तौर पर अपराध से अर्जित की गई कमाई का हिस्सा थी। मामले की जांच अभी भी जारी है और एजेंसियां इस नेटवर्क से जुड़े अन्य पहलुओं की भी पड़ताल कर रही हैं।

इस मामले ने एक बार फिर सोशल मीडिया के जरिए बनाई जा रही फर्जी छवि और प्रभाव के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने अपने आदेश के जरिए साफ संकेत दिया है कि कानून ऐसे मामलों को गंभीरता से देखता है, लेकिन लंबे समय तक जेल में रहने और ट्रायल में देरी जैसे पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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