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LPG VS Ethanol: LPG से सस्ता पड़ेगा एथेनॉल चूल्हा, जानिए क्या है नई टेक्नोलॉजी और कैसे करता है काम



नई दिल्ली। एथेनॉल चूल्हा एक नई पीढ़ी की कुकिंग तकनीक है, जिसमें ईंधन के रूप में लिक्विड या जेल एथेनॉल का इस्तेमाल किया जाता है।
यह वही एथेनॉल है जिसे पेट्रोल में मिलाकर वाहनों में भी इस्तेमाल किया जाता है।

यह चूल्हा LPG सिलेंडर का एक संभावित विकल्प माना जा रहा है क्योंकि यह:

बिना धुआं जलता है

बिना कालिख के खाना पकाता है

तेज और स्थिर आंच देता है

कम लागत में काम करता है

एथेनॉल स्टोव कैसे काम करता है?
एथेनॉल स्टोव की कार्यप्रणाली काफी सरल होती है:

स्टोव के टैंक में लिक्विड या जेल एथेनॉल भरा जाता है

इसे जलाया जाता है

नियंत्रित बर्नर एथेनॉल को पूरी तरह जलाते हैं

इससे LPG जैसी तेज और साफ आंच मिलती है

इस तकनीक में गैस पाइपलाइन या सिलेंडर की जरूरत नहीं होती, जिससे रिस्क भी कम हो जाता है।

LPG vs Ethanol: कौन कितना सस्ता?
रिपोर्ट्स के मुताबिक 1 लीटर एथेनॉल लगभग 15 घंटे तक आंच दे सकता है

LPG की तुलना में इसका प्रति यूनिट कुकिंग खर्च कम पड़ता है

लंबे समय में यह घरेलू बजट पर राहत दे सकता है

यही वजह है कि इसे “स्मार्ट और सस्ता कुकिंग फ्यूल” कहा जा रहा है।

पर्यावरण के लिए कितना फायदेमंद?
एथेनॉल स्टोव को “ग्रीन टेक्नोलॉजी” माना जाता है क्योंकि:

यह कार्बन न्यूट्रल फ्यूल है

गन्ना, मक्का और बायोमास से बनता है

धुआं और जहरीली गैसें नहीं निकलतीं

जंगलों पर ईंधन निर्भरता कम हो सकती है

LPG से कैसे अलग है?
फीचर LPG एथेनॉल स्टोव
ईंधन फॉसिल फ्यूल बायोफ्यूल
धुआं थोड़ा लगभग नहीं
सुरक्षा गैस लीकेज रिस्क कम रिस्क
लागत अधिक कम होने की संभावना
पर्यावरण प्रदूषण क्लीन एनर्जी

नितिन गडकरी का विजन
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कई मंचों पर एथेनॉल आधारित कुकिंग टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने की बात कही है।
उनका मानना है कि अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर अपनाई गई, तो:

LPG पर निर्भरता कम होगी

किसानों को एथेनॉल से नया बाजार मिलेगा

भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा

सेहत और सुरक्षा के फायदे
धुआं न होने से सांस की बीमारियों का खतरा कम

बर्तन काले नहीं पड़ते

आग फैलने का जोखिम LPG की तुलना में कम

इनडोर एयर क्वालिटी बेहतर

एथेनॉल स्टोव आने वाले समय में रसोई की दुनिया में बड़ा बदलाव ला सकता है। यह न सिर्फ LPG का विकल्प बन सकता है, बल्कि सस्ता, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल कुकिंग सिस्टम भी साबित हो सकता है।हालांकि इसका व्यापक उपयोग तभी संभव होगा जब इसका उत्पादन, सप्लाई और कीमत स्थिर रूप से विकसित हो।

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