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राज्यसभा रेस में कमलनाथ का नाम सबसे आगे, सियासी हलचल तेज


मध्यप्रदेश  मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया 8 जून तक पूरी होनी है। इनमें से दो सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं, जबकि एक सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दावा है।इसी एक सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर जबरदस्त सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। दिल्ली से लेकर भोपाल तक बैठकों का दौर जारी है और अगले दो दिनों में उम्मीदवारों के नाम तय होने की संभावना जताई जा रही है।

कमलनाथ रेस में सबसे आगे, दिल्ली का फैसला निर्णायक
सूत्रों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ राज्यसभा उम्मीदवारों की दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी हाईकमान करेगा, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी की भूमिका अहम होगी। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पहले ही तीसरी बार राज्यसभा जाने से इनकार कर चुके हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व यदि चाहे तो उनके नाम पर भी अंतिम निर्णय संभव है।

जातीय समीकरणों पर भी कांग्रेस का फोकस
इस बार कांग्रेस केवल वरिष्ठता नहीं, बल्कि जातीय संतुलन को भी ध्यान में रखकर उम्मीदवार तय करने की रणनीति बना रही है। पार्टी OBC, SC, ST और सामान्य वर्ग से संतुलित प्रतिनिधित्व देने पर विचार कर रही है। इस सूची में पूर्व मंत्री अरुण यादव, सज्जन सिंह वर्मा, कमलेश्वर पटेल समेत कई नामों पर चर्चा चल रही है।

पीसीसी अध्यक्ष जीतू पटवारी भी चर्चा में
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी हालांकि सार्वजनिक रूप से राज्यसभा की रेस से खुद को अलग बता चुके हैं, लेकिन पार्टी के अंदर उनकी सक्रियता और दिल्ली नेतृत्व से संपर्क को लेकर चर्चाएं तेज हैं। सूत्रों के अनुसार संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के स्तर पर भी उनके नाम को लेकर समर्थन की बात सामने आ रही है।

दिल्ली में होगा अंतिम फैसला
कर्नाटक में नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के बाद कांग्रेस मुख्यालय में उच्चस्तरीय बैठक होने की संभावना है। इसी बैठक में मध्यप्रदेश राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों पर अंतिम मुहर लग सकती है। पार्टी रणनीति यह भी है कि आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सभी वर्गों को साधते हुए उम्मीदवारों का चयन किया जाए।

मध्यप्रदेश में राज्यसभा सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर घमासान तेज है। कमलनाथ सबसे आगे जरूर माने जा रहे हैं, लेकिन अंतिम निर्णय पूरी तरह दिल्ली नेतृत्व के हाथ में है। जातीय समीकरण और राजनीतिक संतुलन इस फैसले में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

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