जिले में नर्मदा, हिरण और गौर नदी क्षेत्र में करीब 42 रेत खदानें स्थित हैं, जिनमें से 31 खदानों को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की स्वीकृति प्राप्त है। राज्य सरकार ने इन खदानों के लिए लगभग पांच लाख घनमीटर रेत उत्खनन का टेंडर जारी किया था। इसके बदले करीब 16.5 करोड़ रुपये की लीज राशि निर्धारित की गई थी, लेकिन ऊंची प्रीमियम दर और अधिक उत्खनन लक्ष्य के कारण किसी भी ठेकेदार ने रुचि नहीं दिखाई। लगातार तीन बार टेंडर प्रक्रिया दोहराने के बावजूद खदानों का आवंटन नहीं हो सका।
खनिज कारोबार से जुड़े जानकारों का कहना है कि वर्तमान बाजार परिस्थितियों में इतनी बड़ी राशि और निर्धारित शर्तों के साथ खदानों का संचालन आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं है। यही कारण है कि ठेकेदारों ने दूरी बनाए रखी। अब खनिज विभाग नई रणनीति पर काम कर रहा है। विभाग खदानों की संख्या, उत्खनन की मात्रा और प्रीमियम दरों में कमी कर टेंडर को व्यावहारिक बनाने की तैयारी कर रहा है। जानकारी के अनुसार पांच लाख घनमीटर की सीमा घटाकर करीब साढ़े तीन लाख घनमीटर करने पर विचार किया जा रहा है।
उधर वैध खदानों के बंद होने से अवैध खनन का नेटवर्क लगातार मजबूत हुआ है। रात के अंधेरे में पोकलेन, जेसीबी और हाईवा जैसे भारी वाहनों की मदद से नर्मदा और उसकी सहायक नदियों से बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा रही है। कई स्थानों पर नदी की धाराओं को प्रभावित कर अस्थायी रास्ते और पुल तक बनाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रातभर ट्रैक्टर और हाईवा के जरिए अवैध परिवहन खुलेआम चलता है, लेकिन प्रभावी रोक नहीं लग पा रही।
इसका असर रेत बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। वैध आपूर्ति ठप होने से रेत की उपलब्धता कम हो गई है और कीमतों में भारी उछाल आया है। वर्तमान में जबलपुर में एक हाईवा रेत 28 से 30 हजार रुपये तक बिक रही है, जबकि पड़ोसी कटनी जिले में इसकी कीमत 50 हजार रुपये प्रति हाईवा तक पहुंच गई है। बढ़ती कीमतों का असर निर्माण कार्यों और रियल एस्टेट गतिविधियों पर भी पड़ रहा है।
हालांकि प्रशासन अब सक्रिय नजर आ रहा है। जिला खनिज विभाग, पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीमें बेलखाड़ू, बरगी, सिहोरा और चरगवां क्षेत्रों में लगातार कार्रवाई कर रही हैं। अवैध रूप से भंडारित रेत को जब्त कर नष्ट किया जा रहा है। वहीं भोपाल स्थित खनिज मुख्यालय ने भी जबलपुर की खदानों से संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा शुरू कर दी है। इसके बावजूद सवाल यही है कि जब तक वैध खदानों का संचालन शुरू नहीं होगा, तब तक अवैध खनन पर पूरी तरह लगाम लगाना बड़ी चुनौती बना रहेगा।