यूनियन ने अमेरिकी प्रशासन से अपील करते हुए कहा है कि मृतक भारतीय नाविकों के परिजनों को कम से कम 50 लाख डॉलर का मुआवजा दिया जाए। संगठन का तर्क है कि यह केवल आर्थिक सहायता का विषय नहीं बल्कि उन परिवारों के प्रति नैतिक और मानवीय दायित्व का मामला भी है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया।
एफएसयूआई ने अपने बयान में कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बनी नई समझ क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक कदम है। हालांकि संगठन का मानना है कि स्थायी शांति तभी सार्थक होगी जब संघर्ष और सैन्य कार्रवाई से प्रभावित निर्दोष नागरिकों तथा समुद्री कर्मियों के साथ न्याय सुनिश्चित किया जाए। इसी संदर्भ में भारतीय नाविकों के परिवारों को मुआवजा देने की मांग को प्रमुखता से उठाया गया है।
यूनियन के अनुसार, चीफ इंजीनियर पतनाला सुरेश, डेक कैडेट आदित्य शर्मा और फिटर शिवानंद चौरेसिया की मौत मिसाइल हमले से जुड़ी घटना में हुई थी। वहीं दूसरे अधिकारी निशांत उर्थनाथन की मृत्यु के लिए संगठन ने समय पर चिकित्सीय सहायता नहीं मिल पाने और क्षेत्रीय नाकेबंदी से उत्पन्न परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराया है। संगठन का कहना है कि इन घटनाओं की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।
घटना जून माह में ओमान तट के निकट होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हुई थी। उस समय एमटी सेटेबेलो नामक तेल टैंकर क्षेत्रीय तनाव और सैन्य गतिविधियों के बीच प्रभावित हुआ था। जहाज पर कुल 24 भारतीय चालक दल के सदस्य मौजूद थे। हादसे में चार भारतीय नाविकों की मौत हो गई, जबकि अन्य सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया था।
इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और वाणिज्यिक नौवहन पर भी देखा गया था। भारतीय समुद्री समुदाय ने उस समय चालक दल की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के पालन को लेकर चिंता व्यक्त की थी।
घटना के बाद भारत सरकार ने भी संबंधित पक्षों के समक्ष अपनी चिंता दर्ज कराई थी और वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया था। भारत का मानना रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर काम करने वाले नागरिक कर्मियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
एफएसयूआई का कहना है कि मृतक नाविक किसी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं थे, बल्कि वे पेशेवर दायित्व निभाते हुए अपने परिवारों के लिए काम कर रहे थे। ऐसे में उनकी मृत्यु को केवल एक आकस्मिक घटना मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। संगठन ने मांग की है कि जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ प्रभावित परिवारों को सम्मानजनक सहायता और न्याय उपलब्ध कराया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा व्यवस्था, संघर्ष क्षेत्रों में नागरिक जहाजों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में इस विषय पर होने वाली कूटनीतिक और कानूनी प्रक्रियाओं पर सभी की नजरें बनी रहेंगी।