राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दलों ने पिछले तीन दशकों में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को गहराई से प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों में इन दलों ने न केवल कांग्रेस के पारंपरिक आधार को चुनौती दी, बल्कि कई स्थानों पर उसकी जगह भी ले ली। यही कारण रहा कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता गया और क्षेत्रीय नेतृत्व मजबूत होकर उभरा।
हालांकि हाल के वर्षों में कई क्षेत्रीय दलों के सामने संगठनात्मक चुनौतियां बढ़ती दिखाई दी हैं। कुछ दलों में नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए, तो कुछ जगहों पर वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के अलग रास्ता अपनाने की खबरें सुर्खियों में रहीं। इन परिस्थितियों ने क्षेत्रीय राजनीति की स्थिरता और भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
पश्चिम बंगाल में उभरे राजनीतिक संकट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चाएं हैं कि यदि क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का संकट गहराता है तो वे व्यापक विपक्षी एकजुटता की दिशा में अधिक गंभीरता से कदम बढ़ा सकते हैं। इसी संदर्भ में कांग्रेस की भूमिका पर भी चर्चा बढ़ी है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर वह अभी भी सबसे बड़ा विपक्षी राजनीतिक संगठन मानी जाती है।
विपक्षी गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के रिश्ते हमेशा सरल नहीं रहे हैं। कई राज्यों में सीट बंटवारे, नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ गठबंधन के मुकाबले एक मजबूत राजनीतिक विकल्प खड़ा करने के लिए इन दलों को साथ काम करना पड़ा है। यही व्यावहारिक राजनीति आज भी विपक्षी दलों को सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां कांग्रेस के लिए राजनीतिक अवसर भी लेकर आई हैं। जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव लंबे समय तक कांग्रेस के विस्तार में बाधा बना रहा, वहां अब नए समीकरण बनने की संभावना पर चर्चा हो रही है। कांग्रेस नेतृत्व भी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि व्यापक विपक्षी एकता राष्ट्रीय राजनीति की आवश्यकता है और इसके लिए सभी दलों को व्यक्तिगत तथा क्षेत्रीय हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा।
दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों के सामने भी चुनौती कम नहीं है। उन्हें अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाने के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। यही कारण है कि विपक्षी राजनीति के भीतर सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों समानांतर रूप से दिखाई दे रहे हैं।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल किस प्रकार अपनी रणनीति तय करते हैं। यदि क्षेत्रीय दल और कांग्रेस साझा राजनीतिक मंच को मजबूत करने में सफल रहते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। वहीं यदि संगठनात्मक चुनौतियां और आंतरिक मतभेद बढ़ते हैं तो विपक्षी खेमे के सामने नई कठिनाइयां भी खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने विपक्षी राजनीति को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।