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G7 में जापान का बड़ा संदेश: हिंद-प्रशांत सुरक्षा, चीन की चुनौतियां और होर्मुज जलडमरूमध्य पर जताई चिंता

फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और भू-राजनीतिक चुनौतियों पर व्यापक चर्चा हुई। इस दौरान जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों, चीन से जुड़ी रणनीतिक चुनौतियों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को प्रमुखता से उठाते हुए सदस्य देशों के बीच अधिक समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं भी दबाव का सामना कर रही हैं।

जापानी प्रधानमंत्री ने जी-7 नेताओं के साथ हुई बैठकों और रात्रिभोज चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र आज विश्व राजनीति और वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना केवल एशियाई देशों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आर्थिक और सामरिक हितों के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जापान ने चीन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर अपना दृष्टिकोण साझेदार देशों के सामने रखा है।

ताकाइची ने कहा कि जी-7 देशों के बीच इस बात पर व्यापक सहमति बनी है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में सहयोग और समन्वय को और मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और मजबूत बनाने पर जोर दिया। आधुनिक तकनीक, रक्षा उत्पादन और हरित ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता आज दुनिया की प्रमुख आर्थिक प्राथमिकताओं में शामिल हो चुकी है।

पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए जापानी प्रधानमंत्री ने होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए सभी पक्षों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समुद्री व्यापार निर्बाध रूप से जारी रहे और किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा भी चर्चा का केंद्र रहा। जापान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ सहयोग बढ़ाने और परमाणु प्रसार को रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन किया। जापान का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों के प्रसार को नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है।

इसी सम्मेलन में भारत ने भी विकास साझेदारी और वैश्विक दक्षिण की भूमिका को मजबूती से उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि किसी भी साझेदारी की वास्तविक सफलता इस बात में है कि वह सहयोगी देशों को आत्मनिर्भर बनने में कितना सक्षम बनाती है। उन्होंने अफ्रीका में भारत की विकास परियोजनाओं, कौशल विकास कार्यक्रमों और क्षमता निर्माण प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत साझेदारी के माध्यम से दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

उधर, चीन के बढ़ते निर्यात को लेकर यूरोपीय देशों की चिंताएं भी चर्चा का विषय बनी रहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी शुल्कों के बावजूद चीन का औद्योगिक उत्पादन और निर्यात क्षमता मजबूत बनी हुई है, जिससे वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा और आर्थिक संतुलन से जुड़े नए सवाल खड़े हो रहे हैं। कुल मिलाकर, जी-7 शिखर सम्मेलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में सुरक्षा, व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़े मुद्दे वैश्विक एजेंडे के केंद्र में रहने वाले हैं।

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