– चेतस सुखाड़ियाभारत का छात्र आंदोलन केवल छात्रसंघ चुनावों या शैक्षणिक मांगों तक सीमित नहीं रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रनिर्माण तक विद्यार्थियों ने समय-समय पर अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बदलते समय, शिक्षा के उभरते नए आयाम, तकनीकी क्रांति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में छात्र संगठनों की प्रासंगिकता क्या है? यदि कोई छात्र संगठन समय के साथ स्वयं को समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालते हुए विद्यार्थियों के हितों और राष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करता है, तो उसकी प्रासंगिकता स्वतः सिद्ध होती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) इसी दृष्टि से भारत का एक प्रासंगिक छात्र आंदोलन है। जिसने स्वयं को कालसुसंगत बनाते हुए संपूर्ण विद्यार्थी समाज को अपने साथ जोड़ने कार्य किया है।
9 जुलाई 1949 को स्थापित अभाविप ने अपने आरंभ से ही छात्रशक्ति को राष्ट्रशक्ति के रूप में देखने का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। परिषद का मानना है कि विद्यार्थी केवल भविष्य का नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान का जागरूक और उत्तरदायी नागरिक भी है। इसलिए छात्र जीवन केवल डिग्री प्राप्त करने का काल नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व के विकास का महत्वपूर्ण चरण है। यही विचार परिषद के मूल मंत्र “ज्ञान, शील और एकता” में भी प्रतिबिंबित होता है।
विद्यार्थी परिषद की प्रासंगिकता का सबसे बड़ा आधार यह है कि उसने छात्रहित और राष्ट्रहित को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, समयबद्ध परिणाम, छात्रवृत्ति, छात्रावास, पुस्तकालय, अनुसंधान, कौशल विकास और रोजगारोन्मुख शिक्षा, नवाचार, स्टार्टअप जैसे विषयों पर परिषद लगातार सक्रिय रही है। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं को लोकतांत्रिक माध्यमों से उठाने और उनके समाधान के लिए संवाद तथा आवश्यक होने पर आंदोलन—दोनों मार्गों का उपयोग परिषद की कार्यशैली का हिस्सा रहे हैं। किन्तु अभाविप केवल मांगों और आंदोलनों तक सीमित संगठन नहीं है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका रचनात्मक दृष्टिकोण है। परिषद का विश्वास है कि छात्र समाज का केवल आलोचक नहीं, बल्कि परिवर्तन का सक्रिय सहभागी होना चाहिए। इसी सोच के साथ संगठन ने शिक्षा परिसरों से बाहर समाज जीवन के अनेक क्षेत्रों में भी अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई है।
परिषद के विविध आयाम, गतिविधि उसकी इसी व्यापक सोच को अभिव्यक्त करते हैं। स्टूडेंट्स फॉर डेवलपमेंट (SFD) के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, जैव विविधता, सतत विकास और पर्यावरणीय जागरूकता पर कार्य किया जाता है। स्टूडेंट्स फॉर सेवा (SFS) समाज के वंचित वर्गों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा गतिविधियों को पहुँचाकर विद्यार्थियों में सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव विकसित करता है। खेलो भारत अभियान युवाओं में खेल संस्कृति, अनुशासन और स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित करता है, जबकि राष्ट्रीय कला मंच भारतीय कला, साहित्य, संगीत, रंगमंच और लोक परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का कार्य करता है। वही एग्रीविजन, मीडिविजन, फार्मविजन, जिज्ञास, थिंक इंडिया, इंडिजीनियस जैसे विभिन्न आयामों से यह स्पष्ट है कि विद्यार्थी परिषद विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को महत्व देती है।
महिला सशक्तिकरण भी परिषद के कार्य का महत्वपूर्ण पक्ष है। छात्राओं की सुरक्षा, नेतृत्व विकास, शिक्षा में समान अवसर और आत्मविश्वास बढ़ाने के उद्देश्य से परिषद ने अनेक अभियान चलाए हैं। मिशन साहसी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से छात्राओं को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने का प्रयास किया गया। आज परिषद के संगठनात्मक ढाँचे में बड़ी संख्या में छात्राएँ नेतृत्वकारी भूमिका निभा रही हैं, जो इसकी समावेशी कार्यसंस्कृति का परिचायक है।
वर्तमान समय में शिक्षा जगत नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, मानसिक स्वास्थ्य, रोजगार, स्टार्टअप संस्कृति और अनुसंधान जैसे विषय विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित छात्र गतिविधि पर्याप्त नहीं हो सकती। आवश्यकता है बहुआयामी छात्र गतिविधि की है जो शिक्षा सुधार, नवाचार, सामाजिक संवेदनशीलता, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय विकास जैसे व्यापक विषयों पर भी सक्रिय भूमिका निभाए। विद्यार्थी परिषद ने इन विषयों पर निरंतर संवाद और जनजागरण का प्रयास किया है।
भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में युवा शक्ति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। विश्वविद्यालय और महाविद्यालय केवल रोजगार के लिए डिग्री देने वाले संस्थान न बनकर चरित्र, नेतृत्व, अनुसंधान और सामाजिक उत्तरदायित्व के केंद्र बनें—यह समय की आवश्यकता है। छात्र संगठन यदि इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं, तो वे लोकतंत्र और समाज दोनों को मजबूत करते हैं।
किसी भी छात्र आंदोलन की प्रासंगिकता इस बात से भी निर्धारित होती है कि वह समय की चुनौतियों को कितना समझता है और उनके समाधान में कितना योगदान देता है। सात दशक से अधिक की यात्रा में विद्यार्थी परिषद ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, परंतु उसने स्वयं को केवल एक चुनावी छात्र संगठन तक सीमित नहीं रखा। शिक्षा, सेवा, संगठन, संस्कार, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रनिर्माण जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय रहकर उसने छात्र आंदोलन की व्यापक परिभाषा प्रस्तुत की है।
आज जब भारतीय शिक्षा व्यवस्था परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और युवा शक्ति विकसित भारत के संकल्प की धुरी बनने जा रही है, तब ऐसे छात्र आंदोलनों की आवश्यकता और जिम्मेदारी ओर बढ़ जाती है जो विद्यार्थियों में केवल अधिकारों की चेतना ही नहीं, बल्कि कर्तव्य, नेतृत्व, चरित्र और राष्ट्रभाव का भी विकास करें। यही कारण है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आज भी एक प्रासंगिक, सक्रिय और रचनात्मक छात्र आंदोलन के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।
(लेखक मध्यक्षेत्र संगठन मंत्री – अभाविप हैं)