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भारत में चीता वापसी का नया अध्याय: केन्या से चार चीते जल्द पहुंचेंगे गुजरात के बन्नी..


नई दिल्ली । भारत में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है, जहां अफ्रीकी देश केन्या से चार चीतों को लाकर गुजरात के कच्छ स्थित बन्नी घास के मैदान में बसाने की तैयारी की जा रही है। इस पहल के साथ बन्नी देश का दूसरा ऐसा क्षेत्र बन जाएगा, जहां चीतों को प्राकृतिक वातावरण में पुनर्वासित किया जाएगा। इससे पहले मध्य प्रदेश का कुनो नेशनल पार्क इस महत्वाकांक्षी परियोजना का प्रमुख केंद्र रहा है, जहां पहले से ही चीतों की मौजूदगी दर्ज की जा चुकी है।

योजना के तहत जिन चार चीतों को भारत लाया जाएगा, उनमें दो नर और दो मादा शामिल होंगे। अधिकारियों के अनुसार, इन्हें आगामी महीनों में स्थानांतरित किया जाएगा, जिससे इस संरक्षण परियोजना को नई गति मिलेगी। यह पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है और आने वाले समय में यहां और भी चीतों को लाने की संभावना जताई जा रही है।

बन्नी घास के मैदान अपनी विशालता और प्राकृतिक खुली संरचना के लिए जाने जाते हैं, जो चीतों की जीवनशैली के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। यहां तेज दौड़ने और शिकार करने के लिए पर्याप्त खुला क्षेत्र उपलब्ध है, जिससे उनके अनुकूलन की संभावना और मजबूत हो जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए यहां सुरक्षा व्यवस्था, बाड़बंदी और शिकार आधार को मजबूत करने का कार्य तेजी से किया जा रहा है।

इस पूरे प्रोजेक्ट में स्थानीय समुदाय की भूमिका को भी अहम माना जा रहा है। बन्नी क्षेत्र में रहने वाले समुदायों के साथ समन्वय स्थापित किया जा रहा है ताकि वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन बना रहे। प्रयास किया जा रहा है कि चीतों के आने से न तो स्थानीय पशुपालन प्रभावित हो और न ही पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक असर पड़े।

भारत में इससे पहले नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाया गया था, और अब केन्या से आने वाले चीतों से इस प्रजाति की आनुवंशिक विविधता को और मजबूती मिलने की उम्मीद है। केन्या की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां कुछ हद तक भारत के कई क्षेत्रों से मेल खाती हैं, जिससे इनके अनुकूलन की संभावना बेहतर मानी जा रही है।

कुनो नेशनल पार्क में पहले से मौजूद चीतों की संख्या में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जहां कई मादा चीतों ने शावकों को जन्म दिया है। यह इस बात का संकेत है कि भारत में यह प्रजाति धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ रही है और प्राकृतिक वातावरण में खुद को ढाल रही है।

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