नई दिल्ली । यूरोप की महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजनाओं में शामिल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम के बंद होने के बाद वैश्विक रक्षा क्षेत्र में नए समीकरण उभरते दिखाई दे रहे हैं। फ्रांस ने अब स्पष्ट संकेत दिया है कि वह छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास का काम अपने दम पर आगे बढ़ाएगा। इस निर्णय को केवल एक रक्षा परियोजना का पुनर्गठन नहीं बल्कि यूरोपीय सैन्य उद्योग में बदलते शक्ति संतुलन के रूप में भी देखा जा रहा है।
कई वर्षों से फ्रांस, जर्मनी और स्पेन संयुक्त रूप से FCAS कार्यक्रम पर काम कर रहे थे। इस परियोजना का उद्देश्य वर्ष 2040 के आसपास ऐसी उन्नत लड़ाकू विमान प्रणाली विकसित करना था जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता, मानव रहित सहयोगी प्लेटफॉर्म और अत्याधुनिक स्टेल्थ तकनीकों से लैस हो। हालांकि परियोजना में जिम्मेदारियों, तकनीकी नियंत्रण और औद्योगिक हिस्सेदारी को लेकर लगातार मतभेद सामने आते रहे।
फ्रांसीसी नेतृत्व ने अब संकेत दिया है कि पिछले वर्षों में किए गए अरबों यूरो के निवेश और अनुसंधान कार्य को आधार बनाकर देश अपने स्वतंत्र कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा। फ्रांस का मानना है कि अब तक विकसित की गई तकनीकी क्षमताएं उसे अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान निर्माण की दिशा में आत्मनिर्भर रूप से आगे बढ़ने में सक्षम बनाती हैं। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट पहले से ही राफेल जैसे सफल लड़ाकू विमान का निर्माण कर चुकी है, जिससे इस परियोजना को तकनीकी आधार मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर जर्मनी ने भी अपने सहयोगी औद्योगिक समूहों के साथ अलग रास्ता अपनाने का संकेत दिया है। कई प्रमुख रक्षा और एयरोस्पेस कंपनियों ने मिलकर एक नया औद्योगिक गठबंधन तैयार किया है, जिसका उद्देश्य भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रम को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाना है। इससे स्पष्ट है कि यूरोप अब एक साझा मंच के बजाय समानांतर सैन्य विमानन परियोजनाओं की ओर बढ़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और फ्रांस के बीच पिछले एक दशक में रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद और नौसैनिक सहयोग ने दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई दी है। ऐसे में फ्रांस यदि अपने नए लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की तलाश करता है तो भारत एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में सामने आ सकता है।
हालांकि संभावित साझेदारी का रास्ता आसान नहीं होगा। भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है। किसी भी संयुक्त कार्यक्रम में भारत की प्राथमिकता केवल खरीददार की भूमिका निभाने के बजाय सह-विकास और सह-उत्पादन की होगी। उन्नत इंजन तकनीक, मिशन सिस्टम, सोर्स कोड और महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा तक पहुंच जैसे मुद्दे किसी भी संभावित समझौते के केंद्र में रहेंगे।
इसके साथ ही भारत पहले से ही अपने स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम पर तेजी से काम कर रहा है। ऐसे में नीति निर्माताओं को यह तय करना होगा कि भविष्य की जरूरतों के लिए स्वदेशी परियोजना को प्राथमिकता दी जाए या किसी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के माध्यम से छठी पीढ़ी की तकनीकों तक तेजी से पहुंच बनाई जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फ्रांस की नई रणनीति और भारत की रक्षा आवश्यकताओं के बीच कई साझा अवसर उभर सकते हैं। हालांकि किसी भी संभावित सहयोग का अंतिम स्वरूप तकनीकी हस्तांतरण, लागत, औद्योगिक भागीदारी और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर निर्भर करेगा। फिलहाल FCAS कार्यक्रम का अंत एक अध्याय का समापन जरूर है, लेकिन इससे भविष्य की नई रक्षा साझेदारियों के लिए कई संभावनाएं भी खुलती दिखाई दे रही हैं।