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चार साल बाद दी चुनौती नहीं मिली राहत हाईकोर्ट ने डबरा नगर पालिका चुनाव याचिका खारिज की


ग्वालियर । मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले के डबरा नगर पालिका से जुड़े बहुचर्चित चुनावी विवाद में हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए अध्यक्ष लक्ष्मीबाई को बड़ी राहत दी है। ग्वालियर हाईकोर्ट ने चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि देर से न्याय की मांग करने वालों को राहत नहीं दी जा सकती।

यह मामला वर्ष 2022 के नगर पालिका चुनाव से जुड़ा हुआ था जिसमें लक्ष्मीबाई अध्यक्ष चुनी गई थीं। इस चुनाव को डबरा नगर पालिका के उपाध्यक्ष सत्येंद्र कुमार दुबे और अन्य पार्षदों द्वारा चुनौती दी गई थी। याचिका में यह तर्क रखा गया कि अध्यक्ष के चुनाव का गजट नोटिफिकेशन निर्धारित समय सीमा यानी 30 दिनों के भीतर जारी नहीं किया गया, इसलिए पूरे चुनाव को अवैध घोषित किया जाना चाहिए।

हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और पाया कि जिस मुद्दे को आधार बनाकर याचिका दायर की गई है वह वर्ष 2022 से संबंधित है, जबकि याचिका जनवरी 2026 में दायर की गई। अदालत ने इस देरी को अत्यधिक और अनुचित माना। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा इतनी लंबी देरी के पीछे कोई ठोस और संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जो पक्ष वर्षों तक अपने अधिकारों को लेकर निष्क्रिय रहता है, उसे बाद में संवैधानिक राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत पाने के लिए समय पर कार्रवाई करना अनिवार्य है। देरी से दायर याचिकाओं पर अदालत हस्तक्षेप करने से बचती है, खासकर तब जब संबंधित पदाधिकारी अपने कार्यकाल में कई प्रशासनिक और नीतिगत फैसले ले चुका हो।

कोर्ट ने यह भी माना कि अध्यक्ष लक्ष्मीबाई द्वारा पिछले वर्षों में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा चुके हैं और अब इतने समय बाद चुनाव प्रक्रिया में दखल देना प्रशासनिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में न्यायालय ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

इस फैसले के साथ ही डबरा नगर पालिका में चल रहा यह विवाद समाप्त हो गया है और अध्यक्ष लक्ष्मीबाई की स्थिति पूरी तरह मजबूत हो गई है। हाईकोर्ट के इस निर्णय को प्रशासनिक स्थिरता और समयबद्ध न्याय की आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है, जो यह संदेश देता है कि कानूनी अधिकारों के लिए समय पर कदम उठाना बेहद जरूरी है, अन्यथा देर से की गई कार्रवाई का कोई लाभ नहीं मिलता।

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