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चीनी विमान खरीद सौदे ने नेपाल को कर्ज और घाटे में धकेला, वर्षों से खड़े विमानों पर उठे सवाल; सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस

नई दिल्ली । नेपाल सरकार द्वारा एक दशक पहले चीन से खरीदे गए विमानों का सौदा एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। वर्षों से परिचालन से बाहर पड़े इन विमानों के कारण सरकारी एयरलाइन पर बढ़ते आर्थिक बोझ और कर्ज को लेकर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने यह जानना चाहा है कि भारी वित्तीय नुकसान और कथित अनियमितताओं के बावजूद इस खरीद प्रक्रिया की व्यापक जांच अब तक क्यों नहीं कराई गई। इस घटनाक्रम ने सरकारी खरीद, वित्तीय प्रबंधन और विमानन नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

यह सौदा वर्ष 2014 से 2018 के बीच हुआ था, जब नेपाल ने चीन से अनुदान और रियायती ऋण के माध्यम से छह टर्बोप्रॉप विमान प्राप्त किए थे। इनमें चार Y12E और दो MA60 विमान शामिल थे। इन विमानों को देश के दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों में हवाई संपर्क मजबूत करने के उद्देश्य से खरीदा गया था। हालांकि समय के साथ यह परियोजना अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं हो सकी और अधिकांश विमान परिचालन से बाहर हो गए।

वर्तमान स्थिति यह है कि छह में से पांच विमान कई वर्षों से काठमांडू स्थित त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर निष्क्रिय अवस्था में खड़े हैं। इनका संचालन बंद होने के बावजूद पार्किंग और रखरखाव पर लगातार खर्च हो रहा है, जिससे सरकारी एयरलाइन का वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है। वहीं छठा विमान वर्ष 2020 में नेपालगंज हवाई अड्डे पर रनवे दुर्घटना का शिकार हो गया था और अब उपयोग के योग्य नहीं माना जाता। दुर्घटनाग्रस्त विमान का बीमा दावा मिलने के बावजूद वह अब केवल कबाड़ के रूप में रह गया है।

नेपाल एयरलाइंस ने इन विमानों को दोबारा संचालन में लाने और लीज पर देने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। एयरलाइन का कहना है कि इन विमानों के संचालन की लागत अत्यधिक अधिक है। ईंधन की ज्यादा खपत, स्पेयर पार्ट्स की सीमित उपलब्धता, रखरखाव पर बढ़ता खर्च और कम व्यावसायिक उपयोगिता के कारण इनका संचालन आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रहा। इसके अलावा नेपाल के पर्वतीय हवाई अड्डों की भौगोलिक परिस्थितियों में इन विमानों की उपयोगिता भी सीमित पाई गई।

जांच में यह पहलू भी सामने आया कि एयरलाइन के पास इन विमानों के संचालन के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित पायलट, प्रशिक्षक और तकनीकी इंजीनियर उपलब्ध नहीं थे। आवश्यक स्पेयर पार्ट्स की समय पर आपूर्ति नहीं होने से भी संचालन प्रभावित हुआ। इन सभी कारणों ने मिलकर परियोजना को लगातार घाटे का सौदा बना दिया और सरकारी एयरलाइन की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त दबाव डाला।

हाल ही में इस पूरे मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें विमान खरीद प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इतने बड़े आर्थिक नुकसान और संभावित अनियमितताओं के बावजूद संबंधित एजेंसियों ने प्रभावी जांच नहीं की। अब अदालत द्वारा सरकार से जवाब मांगे जाने के बाद इस विवादित खरीद सौदे की समीक्षा और संभावित जांच की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है। नेपाल में इस मामले को सार्वजनिक धन के उपयोग, सरकारी जवाबदेही और दीर्घकालिक आर्थिक निर्णयों के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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