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मनुस्मृति और भारतीय संविधान : नीति-निदेशक तत्वों का तुलनात्मक दृष्टिकोण..

लेखक: डॉ. राकेश कुमार आर्य

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है। ये ऐसे संवैधानिक निर्देश हैं जो राज्य को लोककल्याण की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, यद्यपि इन्हें न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता। संविधान सभा के सलाहकार सर बी.एन. राव ने इन तत्वों को नैतिक मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में रखने का सुझाव दिया था, जिसे संविधान सभा ने स्वीकार किया।

नीति-निदेशक तत्वों का मूल उद्देश्य यह है कि राज्य एक कल्याणकारी व्यवस्था की ओर अग्रसर हो। अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि ये तत्व न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराए जा सकते, फिर भी शासन की नीतियों के निर्माण में इनका विशेष महत्व है।

अनुच्छेद 38 से 51 तक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक उद्देश्यों को रेखांकित किया गया है। इनमें सामाजिक न्याय, समानता, आजीविका के अवसर, श्रमिक कल्याण, समान वेतन, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, समान नागरिक संहिता तथा अंतरराष्ट्रीय शांति जैसे व्यापक विषय शामिल हैं।

अनुच्छेद 39 विशेष रूप से राज्य को यह निर्देश देता है कि वह संपत्ति और संसाधनों के समान वितरण की दिशा में कार्य करे तथा पुरुषों और महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करे। इसी प्रकार अनुच्छेद 39क में निःशुल्क विधिक सहायता और समान न्याय की व्यवस्था की बात कही गई है।

अनुच्छेद 41 से 43 तक रोजगार, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिकों के जीवन स्तर में सुधार जैसे विषयों पर बल दिया गया है। वहीं अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की अवधारणा प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य देश में समान कानून व्यवस्था स्थापित करना है।

अनुच्छेद 45 और 46 शिक्षा, विशेषकर बाल शिक्षा तथा कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक उत्थान पर केंद्रित हैं। इसके बाद अनुच्छेद 47 सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण स्तर सुधारने का दायित्व राज्य पर डालता है। अनुच्छेद 48 कृषि और पशुपालन तथा 48क पर्यावरण संरक्षण पर बल देता है।

अनुच्छेद 49 राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के संरक्षण, अनुच्छेद 50 न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्करण तथा अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।

इस संदर्भ में लेखक द्वारा मनुस्मृति की परंपरा का उल्लेख करते हुए यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में भी राज्य के कर्तव्यों को लोककल्याण, अनुशासन और न्याय व्यवस्था से जोड़ा गया था। मनु के अनुसार राजा का प्रमुख कर्तव्य प्रजा की रक्षा, न्याय व्यवस्था का पालन और अपराध नियंत्रण माना गया है।

लेख में यह भी बताया गया है कि महर्षि मनु के विचारों के अनुसार शासक को संसाधनों का उपयोग लोकहित में करना चाहिए तथा प्राप्त संपदा को शिक्षा, धर्म, अनाथों और समाज कल्याण में लगाना चाहिए। साथ ही शासक के लिए यह भी आवश्यक माना गया है कि वह राज्य की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखे।

राजा के विभिन्न रूपों—जैसे इंद्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चंद्र आदि—के माध्यम से शासन के विविध गुणों का प्रतीकात्मक वर्णन किया गया है, जिसमें न्याय, अनुशासन, लोकप्रियता, निगरानी और दंड व्यवस्था जैसे तत्वों को जोड़ा गया है।

समग्र रूप से यह लेख यह स्थापित करने का प्रयास करता है कि भारतीय संविधान के नीति-निदेशक तत्व आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की लोककल्याणकारी अवधारणा को स्पष्ट करते हैं, जबकि प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में भी राज्य के कर्तव्यों को नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों से जोड़ने की परंपरा रही है।

इस प्रकार दोनों दृष्टिकोणों में भिन्न ऐतिहासिक संदर्भों के बावजूद लोककल्याण, न्याय और सुव्यवस्था की भावना को एक समान रूप से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

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