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मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड को लेकर बढ़ा विवाद गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के विरोध में तेज हुआ आंदोलन


नई दिल्ली । मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर प्रदेश में विवाद लगातार गहराता जा रहा है। ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी ने इस फैसले का विरोध करते हुए अब सीधे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन के मुख्य संरक्षक शमशुल हसन ने कहा कि वक्फ बोर्ड में दो गैर मुस्लिम सदस्यों को शामिल किए जाने से मुस्लिम समाज की भावनाएं आहत हुई हैं। इसी को लेकर दोनों संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं को पत्र भेजकर मौजूदा आदेश को वापस लेने और बोर्ड का नए सिरे से पुनर्गठन करने की मांग की गई है।

शमशुल हसन ने कहा कि संगठन को वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सनव्वर पटेल या अन्य मुस्लिम सदस्यों के कामकाज पर कोई आपत्ति नहीं है। उनका विरोध केवल उन दो गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर है जिन्हें बोर्ड में शामिल किया गया है। उनका कहना है कि वक्फ इस्लाम से जुड़ी धार्मिक और सामाजिक संस्था है इसलिए इसके संचालन और प्रबंधन में मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों की ही भागीदारी होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में यह भी आग्रह किया गया है कि वर्तमान वक्फ बोर्ड को भंग कर समाज की भावनाओं के अनुरूप नए बोर्ड का गठन किया जाए। उनका विश्वास है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इस विषय की संवेदनशीलता को समझते हुए उचित निर्णय लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अतीत में भी जनभावनाओं को देखते हुए कई महत्वपूर्ण फैसलों पर पुनर्विचार किया गया है इसलिए इस मामले में भी सरकार सकारात्मक कदम उठा सकती है।

इस मुद्दे पर शमशुल हसन ने उन उलेमाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए जिन्होंने नए वक्फ बोर्ड और उसके अध्यक्ष का स्वागत किया है। उनका कहना है कि धार्मिक नेतृत्व को समाज की भावनाओं के साथ खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुरान और हदीस की शिक्षाओं से परिचित होने के बावजूद यदि कोई ऐसे फैसलों का समर्थन करता है तो इससे समाज में नाराजगी बढ़ती है। उन्होंने धार्मिक नेतृत्व से अपने रुख पर पुनर्विचार करने की अपील भी की।

शमशुल हसन ने कहा कि इतिहास में मुस्लिम उलेमाओं ने समाज और धार्मिक संस्थाओं की रक्षा के लिए कई संघर्ष किए हैं। आज भी धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल बयान देने तक सीमित नहीं है बल्कि समुदाय के अधिकारों और धार्मिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने की भी है। उन्होंने कहा कि जो लोग इस मुद्दे पर चुप हैं या समर्थन कर रहे हैं उन्हें इतिहास से सीख लेते हुए समाज के हित में आवाज उठानी चाहिए।

संगठन का दावा है कि केवल मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के कई हिस्सों में मुस्लिम समाज इस फैसले से असंतुष्ट है। उनका कहना है कि यह विरोध किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं बल्कि एक ऐसे निर्णय के विरोध में है जिसे समुदाय अपनी धार्मिक व्यवस्था में हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया तो संगठन लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपना आंदोलन आगे भी जारी रखेगा।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश सरकार ने हाल ही में वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए पहली बार दो गैर मुस्लिम सदस्यों को बोर्ड में शामिल किया है। इसी फैसले के बाद विभिन्न मुस्लिम संगठनों की ओर से विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन देने का सिलसिला लगातार जारी है।

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