नई दिल्ली। भोपाल में नगर निगम की नई प्रशासनिक बिल्डिंग के लोकार्पण के साथ ही एक बड़ी चूक सामने आई है। करीब ₹73 करोड़ की लागत से तैयार इस भव्य भवन में परिषद का मीटिंग हॉल ही नहीं बनाया गया, जिसे अब गंभीर डिजाइन भूल माना जा रहा है। इस कमी के सामने आने के बाद अब प्रशासन परिसर के भीतर ही मीटिंग हॉल बनाने पर मंथन कर रहा है।
इस मुद्दे ने तब तूल पकड़ा जब लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान महापौर मालती राय ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से 5 एकड़ जमीन की मांग रखी। हालांकि, चर्चा के बाद संकेत मिले कि अलग जमीन लेने की बजाय मौजूदा परिसर में ही नया परिषद हॉल तैयार किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, यह हॉल बिल्डिंग के सामने स्थित पार्किंग क्षेत्र में विकसित किया जा सकता है, ताकि भविष्य में परिषद की बैठकें यहीं आयोजित की जा सकें।
गौरतलब है कि इस नई बिल्डिंग की लागत पहले ₹43 करोड़ बताई गई थी, लेकिन लोकार्पण के समय यह आंकड़ा बढ़कर ₹73 करोड़ तक पहुंच गया। इसमें सिविल वर्क के अलावा इंटीरियर, तकनीकी और अन्य सुविधाओं पर खर्च शामिल है। यह भवन प्रदेश का पहला ऐसा नगरीय निकाय मुख्यालय बताया जा रहा है जो ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट और जियोथर्मल तकनीक से लैस है।
‘अटल भवन’ नाम से पहचानी जाने वाली इस आठ मंजिला इमारत में आधुनिक सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा गया है। पार्किंग क्षेत्र में लगे सोलर पैनलों से लगभग 300 किलोवाट बिजली उत्पादन की क्षमता है। इसके साथ ही, भोपाल निगम द्वारा नीमच जिले में विकसित 10.5 मेगावॉट सोलर प्रोजेक्ट का भी लोकार्पण किया गया।
भवन के विभिन्न फ्लोर को विभागवार विभाजित किया गया है। ग्राउंड फ्लोर पर जनसंपर्क, टैक्स काउंटर और विवाह पंजीकरण जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं, साथ ही बच्चों के लिए गेम जोन और मेडिकल इमरजेंसी रूम भी बनाया गया है। पहली से चौथी मंजिल तक महापौर कार्यालय, एमआईसी सदस्य, जलकार्य, राजस्व और अन्य विभाग हैं। पांचवीं से सातवीं मंजिल तक स्मार्ट सिटी, आईटी, स्वास्थ्य और योजना से जुड़े विभागों को रखा गया है, जबकि आठवीं मंजिल पर कमिश्नर कार्यालय और स्मार्ट सिटी मुख्यालय स्थित है।
पूरे भवन में ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ लागू किया गया है, जिससे नागरिकों को एक ही स्थान पर सभी विभागीय सेवाएं मिल सकें। पहले निगम के विभिन्न विभाग शहर के अलग-अलग हिस्सों में संचालित होते थे, लेकिन अब सभी सेवाएं एक ही परिसर में उपलब्ध होंगी।
हालांकि, इस आधुनिक भवन को लेकर कई तकनीकी और डिजाइन खामियां भी सामने आई हैं। सबसे बड़ी चूक परिषद मीटिंग हॉल का न होना माना जा रहा है, जिसे अब प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है। इसके लावा सोलर पैनलों की दिशा और ऊर्जा उत्पादन क्षमता को लेकर भी विशेषज्ञों ने कुछ सवाल उठाए हैं।
बिल्डिंग की डिजाइनिंग तीन अलग-अलग कमिश्नरों के कार्यकाल में पूरी हुई, जिसके चलते परियोजना में कई बदलाव और संशोधन हुए। अब यह भवन न केवल प्रशासनिक केंद्र के रूप में कार्य करेगा, बल्कि शहर की आधुनिक शहरी संरचना का प्रतीक भी माना जा रहा है।
फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि परिषद मीटिंग हॉल का समाधान किस रूप में किया जाता है और यह भव्य लेकिन विवादों में घिरी इमारत आने वाले समय में कितना प्रभावी साबित होती है।