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राज्यपाल के निर्देशों पर विभाग की चुप्पी आदिवासी विकास रिपोर्ट 2 महीने से लंबित


नई दिल्ली ।मध्य प्रदेश में आदिवासी क्षेत्रों के विकास कार्यों को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामला चर्चा में आ गया है। राज्यपाल मंगू भाई पटेल द्वारा मांगी गई रिपोर्ट दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राजभवन तक नहीं पहुंची है। मामला आदिवासी और अनुसूचित क्षेत्रों में जल संसाधन विभाग द्वारा कराए गए विकास कार्यों और उन पर खर्च किए गए बजट से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में देरी को लेकर अब विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार राज्यपाल मंगू भाई पटेल ने आदिवासी क्षेत्रों में चल रही विकास योजनाओं की समीक्षा के उद्देश्य से अप्रैल महीने में जल संसाधन विभाग की प्रमुख अभियंता को पत्र भेजा था। इस पत्र में विशेष रूप से आदिवासी अंचलों में जल आपूर्ति और जल जीवन मिशन से संबंधित परियोजनाओं की विस्तृत जानकारी मांगी गई थी। साथ ही यह भी पूछा गया था कि इन योजनाओं का लाभ कितने लोगों तक पहुंचा और उनका वास्तविक प्रभाव क्या रहा।

राजभवन की ओर से भेजे गए इस पत्र को दो महीने से अधिक समय बीत चुका है लेकिन विभाग की ओर से अब तक कोई विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है। बताया जा रहा है कि विभाग के 116 मुख्य अभियंताओं को इस संबंध में जानकारी एकत्र कर रिपोर्ट भेजने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी लेकिन अपेक्षित कार्रवाई समय पर नहीं हो सकी।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब जून महीने में जनजाति क्षेत्रीय विकास योजना के संचनालय और मध्य प्रदेश शासन ने भी विभाग को अलग से पत्र लिखकर जल्द रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाई गई और मामला लंबित बना हुआ है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल बजट खर्च को लेकर उठ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जल संसाधन विभाग ने पिछले एक वर्ष के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में 38 विभिन्न परियोजनाओं पर लगभग 1085 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। विभाग आवंटित बजट का करीब 95 प्रतिशत हिस्सा उपयोग भी कर चुका है। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद योजनाओं से लाभान्वित हुए लोगों का स्पष्ट ब्यौरा अब तक राजभवन को उपलब्ध नहीं कराया गया है।

राज्यपाल ने अपने पत्र में विशेष रूप से यह जानकारी मांगी थी कि इन परियोजनाओं से कितने आदिवासी परिवारों को वास्तविक लाभ मिला और योजनाओं का जमीनी प्रभाव क्या रहा। लेकिन करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी लाभार्थियों की संख्या और परियोजनाओं के परिणामों को लेकर रिपोर्ट लंबित रहना कई सवाल खड़े कर रहा है।

प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि यदि किसी योजना पर बड़ी राशि खर्च की जाती है तो उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक होता है। ऐसे में राजभवन द्वारा मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराना विभागीय समन्वय और जवाबदेही दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग कब तक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है और आदिवासी क्षेत्रों में खर्च किए गए करोड़ों रुपये के वास्तविक परिणामों का विवरण राजभवन के सामने कब आता है। यह मामला आने वाले दिनों में प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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