फिल्म में पंजाब के उस दौर को दिखाया गया है जब राज्य उग्रवाद और सुरक्षा अभियानों के कारण लगातार सुर्खियों में था। कहानी कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और उन मामलों की पड़ताल पर केंद्रित है, जिन्होंने वर्षों तक सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया। इसी संवेदनशील विषय के कारण फिल्म लंबे समय तक विवादों में रही और इसके शीर्षक तथा अन्य पहलुओं को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई।
पंजाब में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्मों की चर्चा चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती है। हालांकि इस बात पर राय अलग-अलग है कि फिल्म का सीधा चुनावी असर कितना होगा। कुछ लोगों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित रहेगा, जबकि अन्य इसे जनभावनाओं और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने वाला मान रहे हैं।
पंजाब में फिल्मों और राजनीतिक विवादों का इतिहास नया नहीं है। राज्य के इतिहास, धार्मिक भावनाओं, सामाजिक मुद्दों और राजनीतिक घटनाओं पर आधारित कई फिल्मों को पहले भी विरोध और विवाद का सामना करना पड़ा है। विभिन्न अवसरों पर सेंसर प्रक्रिया, प्रदर्शन और सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं ने इन फिल्मों को चर्चा का विषय बनाया है। ऐसे मामलों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन पर भी सवाल खड़े किए हैं।
दिलजीत दोसांझ भी पिछले कुछ वर्षों में कई सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने के कारण चर्चा में रहे हैं। किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने किसानों के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी थी। हालांकि उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और खुद को केवल एक कलाकार मानते हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि राजनीति में आने की उनकी कोई योजना नहीं है।
बीते समय में देश और विदेश में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान भी दिलजीत कई बार सुर्खियों में रहे। उन्होंने विभिन्न मंचों पर पंजाबी संस्कृति और प्रवासी समुदाय की उपलब्धियों का उल्लेख किया, वहीं विवादित राजनीतिक प्रतीकों और अलगाववादी विचारों से दूरी बनाए रखने की भी कोशिश की। उनके इन बयानों को कई लोगों ने संतुलित सार्वजनिक रुख के रूप में देखा।
राजनीतिक गलियारों में समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि लोकप्रिय कलाकार भविष्य में सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन सकते हैं। दिलजीत के मामले में भी ऐसी अटकलें लगती रही हैं, लेकिन उन्होंने अब तक किसी राजनीतिक दल से जुड़ने या चुनाव लड़ने का संकेत नहीं दिया है। उनके हालिया बयान भी यही दर्शाते हैं कि फिलहाल उनका पूरा ध्यान अभिनय, संगीत और सामाजिक विषयों पर आधारित रचनात्मक कार्यों पर है।
फिलहाल ‘सतलुज’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास, सामाजिक विमर्श और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नई चर्चा का माध्यम बन गई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म को दर्शकों का कितना व्यापक समर्थन मिलता है और क्या इससे जुड़ी राजनीतिक चर्चाएं चुनावी माहौल तक कोई प्रभाव छोड़ पाती हैं।