Mahakaushal Times

पत्रकारिता की आज़ादी या जिम्मेदारी? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर बड़ा सवाल

लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि समाज में सच कितनी निर्भीकता से सामने आ पाता है। इसी संदर्भ में प्रेस को हमेशा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। इसकी भूमिका केवल खबरें देने तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता और समाज के बीच पारदर्शिता बनाए रखने की भी है।

लेकिन आज एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है
क्या पत्रकारिता की स्वतंत्रता अपने मूल उद्देश्य से भटक रही है?

क्यों मनाया जाता है विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस?
हर साल 3 मई को ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ मनाया जाता है। इसका उद्देश्य है

प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करना
पत्रकारों के सामने आने वाली चुनौतियों पर ध्यान दिलानाऔर यह सुनिश्चित करना कि मीडिया बिना किसी दबाव के अपना कार्य कर सके। कलम को तलवार से अधिक शक्तिशाली माना गया है, क्योंकि इसी ने समय-समय पर बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश किया है। कई शक्तिशाली लोगों को सत्ता के शिखर से नीचे लाने में पत्रकारिता की निर्णायक भूमिका रही है।

सच की कीमत: जब पत्रकारों को चुकानी पड़ती है जान
इतिहास गवाह है कि सच लिखना और दिखाना हमेशा आसान नहीं रहा।
दुनियाभर में कई पत्रकारों को केवल इसलिए अपनी जान गंवानी पड़ी क्योंकि वे सच्चाई को सामने लाना चाहते थे।

आज भी पत्रकारों पर तीन तरह के खतरे सबसे ज्यादा हैं
राजनीतिक दबाव

आपराधिक गिरोह

और आतंकी संगठन

भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है।

गिरती रैंकिंग: क्या कहती हैं वैश्विक रिपोर्ट्स?
पेरिस स्थित संस्था ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ (RSF) हर साल ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ जारी करती है। यह रिपोर्ट दुनिया भर में प्रेस की स्थिति का आकलन करती है।हाल के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं2026 में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर पहुंच गया2025 में यह रैंक 151 थी2024 में 159, 2023 में 161 और 2022 में 150यानी, उतार-चढ़ाव के बावजूद समग्र स्थिति स्थिर नहीं है और कई बार गिरावट भी दर्ज की गई है।दिलचस्प बात यह है कि नॉर्वे जैसे छोटे देश लगातार शीर्ष स्थान पर बने हुए हैं, जबकि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को इस मामले में संघर्ष करना पड़ रहा है।

क्या खो रहा है संतुलन?
प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट का सीधा असर लोकतंत्र की आत्मा—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—पर पड़ता है।

एक समय था जब मीडिया जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देता था, लेकिन आज विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ हिस्सों में टीआरपी की होड़ ने खबरों की गुणवत्ता को प्रभावित किया है।
बिना पूरी जांच-पड़ताल के सनसनीखेज खबरें परोसना अब आम होता जा रहा है।

इसका परिणाम क्या है?
जनता का मीडिया पर भरोसा कम हो रहा है
लोग तेजी से सोशल मीडिया की ओर बढ़ रहे हैं

सोशल मीडिया और एआई: नई चुनौती
सोशल मीडिया ने जहां सूचना को आसान बनाया है, वहीं फेक न्यूज की समस्या को भी बढ़ा दिया है।
अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आने से यह चुनौती और गंभीर हो गई है, क्योंकि झूठी खबरों को और ज्यादा विश्वसनीय बनाकर पेश किया जा सकता है।ऐसे में जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

संविधान और प्रेस की स्वतंत्रता
भारतीय संविधान में प्रेस को अलग से स्वतंत्रता नहीं दी गई है, बल्कि यह नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ही शामिल है।
हालांकि, देश की एकता और अखंडता के हित में इस स्वतंत्रता पर कुछ सीमाएं भी लगाई जा सकती हैं।

लेकिन जब बिना किसी स्पष्ट खतरे के भी पत्रकारों के लिए काम करना कठिन होता जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

समाधान: स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि,पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए जाएं! मीडिया संस्थानों पर अनावश्यक दबाव न डाला जाए

और पत्रकार बिना भय के काम कर सकें! लेकिन इसके साथ ही एक और सच्चाई को स्वीकार करना होगा!  स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है।मीडिया को अपनी मर्यादाओं का ध्यान रखते हुए निष्पक्ष, सत्य और संतुलित खबरें प्रस्तुत करनी चाहिए।

प्रेस केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का प्रतिबिंब है।
यदि यह स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार रहेगा, तो लोकतंत्र भी मजबूत रहेगा।इसलिए आज जरूरत केवल प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की नहीं, बल्कि उसे सही दिशा में उपयोग करने की भी है।

-योगेश कुमार गोयल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

MADHYA PRADESH WEATHER

आपके शहर की तथ्यपूर्ण खबरें अब आपके मोबाइल पर