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चिड़ियों की बीट से बने 'गुआनो' फॉस्फेट ने रातों-रात चमका दी थी किस्मत: अंधाधुंध खनन और गलत वित्तीय फैसलों से तबाह हो गई पूरी अर्थव्यवस्था

नई दिल्ली । वैश्विक इतिहास में किसी राष्ट्र के आर्थिक उत्थान और पतन की कई कहानियां दर्ज हैं, लेकिन प्रशांत महासागर के एक छोटे से द्वीप देश नाउरू का किस्सा दुनिया में सबसे अनोखा और अप्रत्याशित माना जाता है। दुनिया के नक्शे पर एक सूक्ष्म बिंदु के समान दिखने वाले इस देश ने किसी तेल के कुएं या सोने की खदान के दम पर नहीं, बल्कि केवल और केवल समुद्री चिड़ियों की बीट (पॉटी) के जरिए वह रूतबा हासिल किया था, जिसे देखकर दुनिया के बड़े और शक्तिशाली देश भी दंग रह गए थे। प्रशांत महासागर के माइक्रोनेशिया क्षेत्र में स्थित नाउरू दुनिया का सबसे छोटा स्वतंत्र गणराज्य है, जिसका क्षेत्रफल इतना सीमित है कि कोई भी व्यक्ति कुछ ही घंटों में पैदल चलकर इसकी सीमा नाप सकता है।

इस नन्हे से द्वीप की कायापलट के पीछे एक बेहद दिलचस्प प्राकृतिक वैज्ञानिक कारण रहा है। दरअसल, इस सुदूर द्वीप पर हजारों सालों से लाखों की संख्या में प्रवासी और स्थानीय समुद्री पक्षी आते थे। इन पक्षियों की बीट सालों-साल एक के ऊपर एक जमा होती रही, जिसने कालांतर में एक बेहद सख्त और कड़क चट्टान का रूप धारण कर लिया। वैज्ञानिक भाषा में इस विशेष प्राकृतिक जमाव को ‘गुआनो’ कहा जाता है, जो उच्च गुणवत्ता वाले फास्फेट से पूरी तरह समृद्ध था। इस गुआनो फॉस्फेट में फास्फोरस की प्रचुर मात्रा होने के कारण यह दुनिया का सबसे बेहतरीन और मांग में रहने वाला प्राकृतिक उर्वरक यानी खाद बन गया, जिसकी वैश्विक कृषि बाजार में भारी मांग थी।

साल 1968 में जब नाउरू को औपनिवेशिक नियंत्रण से स्वतंत्रता मिली, तो इस नई सरकार ने अपने इस प्राकृतिक फॉस्फेट खनन का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की बढ़ती कीमतों के बीच नाउरू की किस्मत रातों-रात पूरी तरह बदल गई। दुनिया भर के देश अपनी खेती को बेहतर बनाने के लिए इस बेहतरीन प्राकृतिक खाद को ऊंचे दामों पर खरीदने लगे, जिससे नाउरू पर विदेशी मुद्रा की अंधाधुंध बारिश होने लगी। कुछ ही वर्षों के भीतर यह छोटा सा द्वीप प्रति व्यक्ति आय के मामले में खाड़ी के तेल उत्पादक देशों को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश बन गया।

अचानक आई इस अकूत संपत्ति ने वहां के नागरिकों की जीवनशैली को पूरी तरह से विलासिता में बदल दिया। जिस द्वीप पर कभी यातायात के सामान्य साधन भी उपलब्ध नहीं थे, वहां लगभग हर परिवार के पास कई महंगी विदेशी स्पोर्ट्स कारें आ गईं। लोग सामान्य खरीदारी करने के लिए भी सीधे निजी विमानों से विदेशों का रुख करने लगे। सरकार ने अपनी जनता के लिए पूरी तरह से टैक्स फ्री व्यवस्था लागू कर दी और शिक्षा, चिकित्सा जैसी सभी बुनियादी सुविधाएं पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और मुफ्त कर दीं। तत्कालीन समय में पैसे की कोई कमी न होने के कारण दूरदर्शिता को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया और अंधाधुंध खर्च का दौर शुरू हो गया।

हालांकि, प्रकृति के इस अनमोल खजाने पर टिकी यह विलासिता लंबे समय तक नहीं चल सकी। धन के अत्यधिक लालच में आकर द्वीप की पूरी जमीन का बिना किसी वैज्ञानिक और भविष्य की योजना के अंधाधुंध खनन किया गया। अत्यधिक खुदाई के कारण पूरा द्वीप एक बंजर और पथरीले मरुस्थल में तब्दील हो गया, जिससे वहां की उपजाऊ मिट्टी पूरी तरह नष्ट हो गई और खेती करना असंभव हो गया। धीरे-धीरे फॉस्फेट का यह सीमित खजाना पूरी तरह समाप्त हो गया। जब मुख्य आय का स्रोत बंद हुआ, तो देश की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह गई। फॉस्फेट के दौर में सरकार द्वारा किए गए तमाम गलत अंतरराष्ट्रीय निवेश भी पूरी तरह डूब गए, जिससे देश भारी विदेशी कर्ज के जाल में फंस गया और आज अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह अन्य देशों की सहायता पर निर्भर है।

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