साप्ताहिक कारोबार के दौरान निफ्टी में 0.18 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई जबकि अंतिम कारोबारी सत्र में यह 24 हजार 56 अंक पर बंद हुआ। वहीं सेंसेक्स 109 अंक की बढ़त के साथ 77 हजार 100 अंक पर बंद हुआ। पूरे सप्ताह सेंसेक्स में करीब 0.39 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। हालांकि प्रमुख सूचकांकों की मजबूती के बीच व्यापक बाजार में मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य होते हालात से कच्चे तेल की कीमतें फिर से युद्ध पूर्व स्तर के करीब पहुंच गई हैं। इसका सीधा फायदा भारत जैसे तेल आयातक देशों को मिल रहा है। सस्ता कच्चा तेल महंगाई पर दबाव कम करता है और चालू खाते के घाटे तथा राजकोषीय स्थिति को भी बेहतर बनाने में मदद करता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मौद्रिक नीति में लचीलापन बनाए रखने की संभावना मजबूत होती है।
इस सप्ताह सेक्टर आधारित प्रदर्शन की बात करें तो फार्मा और हेल्थकेयर शेयरों में सबसे अधिक तेजी देखने को मिली। निजी बैंकों के शेयरों को भी आरबीआई की एफसीएनआर जमा स्वैप योजना से जुड़ी स्पष्टता का लाभ मिला। दूसरी ओर धातु क्षेत्र के शेयरों पर कमोडिटी कीमतों में गिरावट का असर दिखाई दिया जबकि उपभोक्ता मांग को लेकर बनी चिंताओं के कारण कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर भी दबाव में रहा।
हालांकि बाजार के लिए कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि देश में मानसून का असमान वितरण कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग को प्रभावित कर सकता है जिससे महंगाई बढ़ने का जोखिम बना रहेगा। इसके बावजूद निवेशकों का रुझान फिलहाल सकारात्मक बना हुआ है।
तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार निकट भविष्य में निफ्टी के लिए 24 हजार 400 और 24 हजार 500 अंक प्रमुख प्रतिरोध स्तर रहेंगे जबकि 23 हजार 900 और 23 हजार 800 अंक मजबूत समर्थन माने जा रहे हैं। बैंक निफ्टी के लिए 57 हजार 500 से 57 हजार 400 का दायरा सपोर्ट और 58 हजार 900 से 59 हजार का स्तर रेजिस्टेंस माना जा रहा है।
आने वाले सप्ताह में निवेशकों की नजर कंपनियों के पहली तिमाही के नतीजों पर रहेगी। इसके साथ ही अमेरिका के पीसीई महंगाई आंकड़े नॉन फार्म पेरोल बेरोजगारी दर तथा भारत के औद्योगिक उत्पादन और जून महीने के पीएमआई आंकड़े भी बाजार की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत बुनियादी आधार वाली कंपनियों में लंबी अवधि के निवेश के अवसर अभी भी बने हुए हैं।