नेपाल का दावा है किलिपुलेख दर्रा उसका हिस्सा है और इस मार्ग का इस्तेमाल उसकी सहमति के बिना नहीं किया जा सकता। वहीं भारत का कहना है कि लिपुलेख ऐतिहासिक रूप से भारतीय क्षेत्र का हिस्सा रहा है और लंबे समय से इसका उपयोग व्यापार और तीर्थ यात्रा के लिए होता आया है।
फिर क्यों उठा विवाद?
लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सीमा विवाद चला आ रहा है। नेपाल की राजनीति में यह मुद्दा अक्सर घरेलू असंतोष और राजनीतिक दबाव से ध्यान हटाने के लिए इस्तेमाल होता रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री K. P. Sharma Oli ने इस मुद्दे को काफी आक्रामक तरीके से उठाया था। अब बालेन शाह सरकार भी उसी राह पर चलती नजर आ रही है, हालांकि उनका राजनीतिक उदय भ्रष्टाचार और आंतरिक अव्यवस्था के खिलाफ आंदोलन से हुआ था।
भारत के लिए क्यों अहम है लिपुलेख?
कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह सामरिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अहम क्षेत्र है। भारत इस इलाके को अपनी प्रशासनिक सीमा का हिस्सा मानता है और यहां लंबे समय से उसका नियंत्रण रहा है।
घरेलू राजनीति का दबाव
विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में भारत के प्रति नरम रुख अपनाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जाता है। यही वजह है कि नई सरकार भी सीमा विवाद पर सख्त रुख दिखाने की कोशिश कर रही है। हालांकि नेपाल के विदेश मंत्रालय का बयान अपेक्षाकृत संयमित माना जा रहा है और उसमें सीधे टकराव की भाषा से बचा गया है।
चीन भी बना समीकरण का हिस्सा
इस पूरे विवाद में चीन की भूमिका भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि कैलाश मानसरोवर यात्रा और व्यापार मार्ग सीधे तिब्बत क्षेत्र से जुड़े हैं। हालांकि बीजिंग ने अब तक संप्रभुता के मुद्दे पर खुलकर कोई पक्ष नहीं लिया है, लेकिन नेपाल-भारत संबंधों में यह मुद्दा एक बार फिर संवेदनशील बन गया है।