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भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई: 1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के जीर्णोद्धार में तकनीक और एआई की मदद देगा भारत

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक साझेदारी को एक नई और अभूतपूर्व मजबूती मिलने जा रही है। वैश्विक भू-राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच दोनों देश अपने प्राचीन संबंधों को रणनीतिक दिशा देने में जुट गए हैं। इस महत्वपूर्ण राजनयिक पहल के तहत भारत, इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित 1170 साल पुराने ऐतिहासिक प्राम्बानन शिव मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार और संरक्षण कार्य में अपना तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा। यह प्राचीन हिंदू मंदिर परिसर वर्तमान में यूनेस्को (UNESCO) का एक प्रतिष्ठित विश्व धरोहर स्थल है।

इस विशाल मंदिर परिसर के इतिहास की खोज का सफर काफी दिलचस्प रहा है। वर्ष 1733 में डच औपनिवेशिक शासन के दौरान एक अधिकारी ने जावा के जंगलों में पत्थरों का एक विशाल ढेर देखा था, जिसे स्थानीय लोग ‘रोरो जोंग्रांग’ नामक राजकुमारी की लोककथा से जोड़कर देखते थे। इसके बाद 19वीं और 20वीं शताब्दी में जब इस स्थान पर वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई की गई, तब वहां पत्थरों पर प्राचीन संस्कृत और पुरानी जावानीज भाषा में लिखे कई महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुए। इन शिलालेखों में इस स्थान को ‘शिवगृह’ के रूप में संबोधित किया गया था और इस पर वर्ष 856 अंकित था, जिससे इसके शिव मंदिर होने की आधिकारिक पुष्टि हुई।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण मातरम साम्राज्य के हिंदू संजय वंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था। इसकी शुरुआत राजा राकाई पिकातन ने वर्ष 850 के आसपास की थी, जबकि मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन उनके उत्तराधिकारी राजा लोकपाल ने वर्ष 856 में संपन्न कराया था। यह परिसर केवल भगवान शिव को ही समर्पित नहीं है, बल्कि यह हिंदू धर्म के तीनों मुख्य देवताओं—ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित होने के कारण ‘त्रिमूर्ति मंदिर’ भी कहलाता है। परिसर का मुख्य शिव मंदिर लगभग 47 मीटर ऊंचा है और इसकी दीवारों पर पत्थरों को तराशकर रामायण की संपूर्ण गाथा अत्यंत खूबसूरती से उकेरी गई है।

ऐतिहासिक शोधों से स्पष्ट होता है कि इंडोनेशिया में हिंदू धर्म का प्रसार किसी सैन्य आक्रमण या बलप्रयोग के कारण नहीं, बल्कि ईसा की पहली शताब्दी में भारत के दक्षिणी छोर (वर्तमान तमिलनाडु) से समुद्री जहाजों द्वारा पहुंचे व्यापारियों के माध्यम से हुआ था। इन व्यापारियों के साथ गई हिंदू संस्कृति, कला, संस्कृत भाषा और पूजा पद्धतियों ने स्थानीय राजाओं को काफी प्रभावित किया, जिसके बाद उन्होंने भारत से विद्वान ब्राह्मणों को अपने राज्य में आमंत्रित किया। बाद में 10वीं शताब्दी के दौरान पास के मेरापी ज्वालामुखी में हुए भीषण विस्फोट और भूकंप के कारण इस क्षेत्र की आबादी को पूर्व की ओर पलायन करना पड़ा, जिससे यह संस्कृति मुख्य रूप से बाली द्वीप तक ही सीमित रह गई।

अब इस नए दौर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के विशेषज्ञ इस प्राचीन धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए इंडोनेशियाई प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इस जीर्णोद्धार कार्य में ‘अनास्टाइलोसिस’ तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसके तहत परिसर में बिखरे मूल पत्थरों को ही आपस में जोड़कर मंदिर को उसकी पुरानी शक्ल दी जाएगी। इस जटिल कार्य को सुगम बनाने के लिए आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का भी सहारा लिया जाएगा, जो पत्थरों के सटीक मिलान में मदद करेगी। शुरुआत में इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक या दो छोटे मंदिरों पर काम शुरू किया जाएगा। वैश्विक पटल पर यह अनूठी पहल दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश और सबसे बड़ी हिंदू आबादी वाले देश के बीच आपसी सौहार्द का एक बेजोड़ उदाहरण पेश कर रही है।

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