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वैश्विक बहस के बीच भारत का पलटवार, हम कचरा नहीं, रीसाइक्लिंग हब हैं

नई दिल्ली ।  भारत के टेक्सटाइल उद्योग को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठे सवालों के बीच सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि देश को “कपड़ा कचरे का डंपिंग ग्राउंड” बताना न केवल गलत है बल्कि वास्तविक तथ्यों से परे भी है। सरकार का कहना है कि भारत का टेक्सटाइल सेक्टर एक मजबूत और विकसित होता हुआ पुनर्चक्रण तंत्र है, जो लंबे समय से पुनः उपयोग और संसाधन बचत की परंपरा पर आधारित है।

हाल ही में इस क्षेत्र को लेकर कुछ आलोचनात्मक दावे सामने आए, जिनमें विशेष रूप से कुछ औद्योगिक क्लस्टर्स की परिस्थितियों को आधार बनाकर भारत के पूरे टेक्सटाइल सिस्टम को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया। सरकार का कहना है कि इस तरह के आकलन अधूरे हैं, क्योंकि वे केवल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं और सुधार की दिशा में हो रहे व्यापक बदलावों को नजरअंदाज करते हैं।

वस्त्र मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत में टेक्सटाइल उत्पादन और प्रसंस्करण से जुड़ा बड़ा हिस्सा पहले से ही पुनर्चक्रण प्रणाली का हिस्सा बन जाता है। विशेष रूप से उत्पादन चरण में उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा दोबारा उपयोग या रीसाइक्लिंग प्रक्रिया में चला जाता है। यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि उद्योग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि अपशिष्ट प्रबंधन को भी समान रूप से महत्व दे रहा है।

सरकार ने यह भी कहा कि देश में उत्पन्न होने वाले कुल टेक्सटाइल कचरे का अधिकांश भाग घरेलू स्रोतों से आता है, जबकि विदेशी कचरे का योगदान अपेक्षाकृत बहुत कम है। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि भारत बाहरी देशों के फास्ट-फैशन कचरे का केंद्र बन गया है। इसके बजाय, भारत का सिस्टम घरेलू स्तर पर उत्पन्न कचरे को ही प्रभावी ढंग से संभालने और पुनः उपयोग करने पर केंद्रित है।

टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से जुड़ा यह पूरा तंत्र केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक ढांचा भी बन चुका है। इस क्षेत्र से जुड़े उद्योग हर वर्ष बड़ी आर्थिक गतिविधि उत्पन्न करते हैं, जिससे रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमों को भी इस सेक्टर से मजबूती मिल रही है, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों अर्थव्यवस्थाओं में इसका प्रभाव देखा जा सकता है।

सरकारी पक्ष के अनुसार, वैज्ञानिक अध्ययन यह भी बताते हैं कि पुनर्चक्रण प्रक्रिया नए फाइबर उत्पादन की तुलना में पर्यावरण पर कम दबाव डालती है। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आती है और ऊर्जा की खपत भी घटती है। यह तथ्य भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को केवल आर्थिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।

हालांकि सरकार ने यह स्वीकार किया है कि पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट मैनेजमेंट, अनौपचारिक क्षेत्र की कार्यप्रणाली और श्रमिक सुरक्षा जैसी चुनौतियां अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। लेकिन इन समस्याओं के समाधान के लिए लगातार प्रयास जारी हैं और उद्योग को अधिक संगठित, सुरक्षित और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

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