वित्त वर्ष 2013-14 में भारत का रक्षा निर्यात केवल 686 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इस तेज वृद्धि में सरकारी रक्षा उपक्रमों के साथ-साथ निजी कंपनियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहल ने घरेलू रक्षा उत्पादन को नई गति दी है।
भारतीय रक्षा निर्यात में सबसे अधिक चर्चा ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की हो रही है। फिलीपींस के बाद वियतनाम ने भी ब्रह्मोस खरीदने के लिए समझौता किया है, जबकि इंडोनेशिया के साथ बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। इसके अलावा आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, एटीएजीएस तोप और आधुनिक रडार सिस्टम जैसे स्वदेशी रक्षा उपकरण भी कई देशों की पहली पसंद बन रहे हैं। आर्मेनिया जैसे देशों ने इन प्रणालियों का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है।
भारतीय हथियारों की बढ़ती स्वीकार्यता के पीछे उनकी आधुनिक तकनीक, विश्वसनीयता और प्रतिस्पर्धी कीमत को प्रमुख कारण माना जा रहा है। हाल के वर्षों में भारतीय रक्षा प्रणालियों के सफल प्रदर्शन ने भी वैश्विक स्तर पर इनकी विश्वसनीयता को मजबूत किया है। इससे कई नए देशों ने भारतीय रक्षा उत्पादों में रुचि दिखाई है।
रक्षा क्षेत्र में बढ़ते निर्यात का सीधा लाभ भारतीय उद्योग, रोजगार और अर्थव्यवस्था को भी मिल रहा है। रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में निवेश बढ़ने के साथ नई तकनीकों का विकास और निजी कंपनियों की भागीदारी भी लगातार मजबूत हो रही है। इससे भारत धीरे-धीरे रक्षा आयातक देश की छवि से बाहर निकलकर एक प्रमुख रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित हो रहा है।
सरकार ने आने वाले वर्षों में रक्षा निर्यात को और बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है। वित्त वर्ष 2029-30 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा गति बरकरार रहती है तो भारत वैश्विक रक्षा निर्यात बाजार में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करेगा तथा स्वदेशी रक्षा उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।