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भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जंग रहे युद्ध के बीच अमेरिका साउथ ईस्ट एशिया में स्थित एक मुस्लिम देश संग मिलकर बड़ा खेल करने की तैयारी में था। हालांकि एक भारतीय रिपोर्ट ने इस प्लान पर पानी फेर दिया है। बीते दिनों अमेरिका और दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया के बीच एक सीक्रेट समझौते की तैयारी चल रही थी, लेकिन अब इंडियन मीडिया की एक रिपोर्ट से हुए खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है।

दरअसल अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक डिफेंस डील साइन होनी थी। हालांकि डील साइन होने से ठीक पहले 12 अप्रैल को एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अमेरिका इंडोनेशिया के एयरस्पेस में अपने सैन्य विमानों को पूरी इजाजत देने की योजना बना रहा है। इस लीक के बाद इंडोनेशिया में भारी हंगामा हुआ और आखिरकार इस प्रावधन को फाइनल डील से बाहर कर दिया गया है।
रिपोर्ट में हुआ खुलासा

इस डील की पूरी जानकारी रिपोर्ट ‘संडे गार्जियन’ में प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच कई महीने से इस गुप्त योजना पर काम कर रही थी। फरवरी में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच वाइट हाउस में हुई बैठक में भी इस पर चर्चा हुई थी। इसे 13 अप्रैल को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री शाफ्री जमसोएद्दीन की बैठक में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना था, लेकिन विवाद के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।

डील में क्या था?

इस प्रस्तावित डील के तहत अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशिया के एयरस्पेस में बिना किसी रोक-टोक के उड़ान भरने की इजाजत मिल जाती। आधिकारिक तौर पर इसे इमरजेंसी और संकट के समय इस्तेमाल के लिए बताया गया, लेकिन इसका असली मकसद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में निगरानी बढ़ाना था, खासकर उस समय जब ईरान ने होर्मुज पर दबाव बढ़ा दिया है और ग्लोबल ऑयल सप्लाई प्रभावित हो रही है। ऐसे में अमेरिका मलक्का स्ट्रेट पर पकड़ मजबूत करना चाहता था, जो दुनिया का सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्ग है और जहां से करीब 30 प्रतिशत समुद्री तेल और 40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार गुजरता है।
इंडोनेशिया ही क्यों?

इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति इस रणनीति के केंद्र में है, क्योंकि वह मलक्का के पास स्थित है।

अमेरिका के लिए यह डील इंडो-पैसिफिक में चीन पर नजर रखने के लिए अहम साबित हो सकती थी, क्योंकि फिलहाल उसे उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के सैन्य ठिकानों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो दूरी के लिहाज से कम प्रभावी हैं।
क्यों हटना पड़ा पीछे?

हालांकि जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, इंडोनेशिया में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया। जकार्ता में सांसदों ने इस तरह के किसी भी समझौते की वैधता पर सवाल उठाए। संसद के डिप्टी चेयर सुकामता ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी सैन्य सहयोग के लिए संसद से सलाह लेना जरूरी है और बिना कानूनी आधार के एयरस्पेस देना संभव नहीं है।

इस विरोध के बाद प्रबोवो सरकार दबाव में आ गई। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि अमेरिकी विमानों को ओवरफ्लाइट एक्सेस देने का प्रस्ताव फाइनल डील का हिस्सा नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह सिर्फ “लेटर ऑफ इंटेंट” के स्तर पर चर्चा में था और अभी न तो अंतिम है और न ही बाध्यकारी। साथ ही यह भी कहा गया कि किसी भी समझौते में इंडोनेशिया की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह डील फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।

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