बीते तीन महीनों के आंकड़े बताते हैं कि मिडिल क्लास परिवारों का मासिक बजट तेजी से बिगड़ा है। फरवरी-मार्च में जो घरेलू खर्च लगभग 9,258 रुपए में पूरा हो जाता था, वही मई के अंत तक बढ़कर 12,318 रुपए तक पहुंच गया है। यानी करीब 33 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है और औसतन हर परिवार पर लगभग 3 हजार रुपए का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।
सबसे ज्यादा असर रसोई के खर्चों पर देखने को मिल रहा है। सब्जियों, दाल, तेल और मसालों के दामों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां 2,500 रुपए में मासिक सब्जियों का खर्च पूरा हो जाता था, अब वही खर्च 3,500 से 3,800 रुपए तक पहुंच गया है। दूध और गैस सिलेंडर की कीमतों में भी इजाफा हुआ है, जिससे घरेलू बजट और अधिक दबाव में आ गया है।
बिजली की बढ़ी खपत ने भी लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। गर्मी के मौसम में कूलर, पंखे और एसी के उपयोग से बिजली बिल में डेढ़ से दो गुना तक बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। छोटे दुकानदारों और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह अतिरिक्त बोझ बन गया है, क्योंकि उन्हें बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डालनी पड़ रही है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। मध्य प्रदेश में पेट्रोल की कीमतें लगभग 116 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच चुकी हैं, जबकि डीजल भी 100 रुपए के करीब है। इसका असर केवल वाहन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवहन महंगा होने से सब्जियां, दूध, दवाइयां और अन्य जरूरी वस्तुएं भी प्रभावित हो रही हैं।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर पहले से ही दबाव में है। कारोबारियों के अनुसार, वाहनों में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स, टायर, इंजन ऑयल और अन्य संसाधनों की कीमतों में 30 से 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। डीजल की कीमतों ने स्थिति को और कठिन बना दिया है। इसी कारण ट्रांसपोर्टरों ने संकेत दिए हैं कि 1 जून से मालभाड़े में 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि की जा सकती है।
इस बढ़ती लागत का असर सीधे बाजार पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि मालभाड़ा बढ़ने के बाद सब्जियां, राशन, दवाइयां, होटल सेवाएं, डिलीवरी चार्ज और यहां तक कि बस-ऑटो किराए तक प्रभावित होंगे। आम जनता को हर स्तर पर महंगाई का नया झटका लग सकता है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों का असर बहु-स्तरीय होता है। एक लीटर पेट्रोल या डीजल की कीमत बढ़ने से न केवल परिवहन खर्च बढ़ता है, बल्कि पूरी सप्लाई चेन महंगी हो जाती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और भी बढ़ सकता है।
फिलहाल स्थिति यह है कि आम उपभोक्ता पहले से ही बढ़ते खर्चों से जूझ रहा है और आने वाला समय और अधिक आर्थिक दबाव लेकर आ सकता है।