राजधानी भोपाल में पेट्रोल की कीमत अब बढ़कर ₹111.71 प्रति लीटर तक पहुंच गई है, जिससे आम लोगों के बजट पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। बीते 9 दिनों में यह तीसरी बार है जब ईंधन के दाम बढ़ाए गए हैं, जिससे कुल मिलाकर मई महीने में पेट्रोल-डीजल लगभग ₹5 प्रति लीटर तक महंगे हो चुके हैं।
इससे पहले 15 मई को पहली बार करीब ₹3 प्रति लीटर की बड़ी बढ़ोतरी की गई थी, जबकि 19 मई को दूसरी बार लगभग 90 पैसे प्रति लीटर का इजाफा हुआ था। अब लगातार हो रही इस बढ़ोतरी ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।
तेल कीमतों में इस उछाल की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की बढ़ती कीमतें बताई जा रही हैं। वैश्विक तनाव और ईरान-अमेरिका जैसे हालात के कारण कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जबकि कुछ समय पहले यह लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं।
कच्चे तेल की कीमतों में इस बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 90% तेल आयात करता है। इसी वजह से तेल कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ता है और वे कीमतों में बढ़ोतरी करने को मजबूर हो जाती हैं।
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें प्रतिदिन सुबह 6 बजे संशोधित की जाती हैं, जिसे ‘डेली प्राइस रिवीजन’ प्रणाली कहा जाता है। इस प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और टैक्स संरचना को ध्यान में रखा जाता है।
ईंधन की अंतिम कीमत में कई घटक शामिल होते हैं—कच्चे तेल की मूल कीमत, रिफाइनिंग खर्च, केंद्र सरकार का एक्साइज ड्यूटी, डीलर कमीशन और राज्य सरकार का वैट (VAT)। इन्हीं कारणों से अलग-अलग राज्यों और शहरों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें अलग-अलग होती हैं।
सरकारी तेल कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते दबाव के कारण उन्हें भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ रहा था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनियों को हर महीने करीब ₹30,000 करोड़ तक का घाटा हो रहा था, जिसे कम करने के लिए कीमतों में समायोजन जरूरी हो गया।
गौरतलब है कि 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ₹2 प्रति लीटर की कटौती की गई थी, जिसके बाद लंबे समय तक दरें स्थिर रहीं। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय हालात बदलने के साथ एक बार फिर ईंधन महंगा होने लगा है।
कुल मिलाकर, लगातार बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतें आम जनता के लिए एक और आर्थिक चुनौती बनकर सामने आई हैं, जिसका असर आने वाले दिनों में परिवहन और रोजमर्रा की लागत पर भी दिखाई दे सकता है।