नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच हालिया कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद दोनों देशों के संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण दौर में पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनके देश को अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं है और यदि किसी भी समझौते का उल्लंघन किया गया या दबाव बनाने की कोशिश हुई तो ईरान अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। उनके इस बयान ने पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक परिस्थितियों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
गालिबाफ ने कहा कि ईरान ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा तैयारियों में कभी ढील नहीं दी है। उनका कहना था कि किसी भी देश के साथ वार्ता तभी प्रभावी हो सकती है, जब वह अपनी सुरक्षा के प्रति पूरी तरह सक्षम और आत्मनिर्भर हो। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अमेरिका भविष्य में किसी समझौते से पीछे हटता है या अपने वादों का पालन नहीं करता है, तो ईरान मजबूती के साथ उसका जवाब देने की क्षमता रखता है। उनके अनुसार, देश की सुरक्षा और जनता के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
ईरानी संसद अध्यक्ष ने यह भी बताया कि हालिया वार्ता के दौरान उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व के सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी थी। उन्होंने कहा कि ईरान का अनुभव बताता है कि केवल आश्वासनों के आधार पर भरोसा नहीं किया जा सकता और किसी भी बातचीत के साथ रक्षा तैयारियों को समान महत्व देना आवश्यक है। उनका मानना है कि कूटनीति तभी सफल हो सकती है जब राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता न किया जाए।
दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को लेकर अपना रुख सख्त बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच पहले लागू युद्धविराम की स्थिति अब प्रभावी नहीं रही है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बातचीत के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन किसी भी आगे की प्रक्रिया में अमेरिका अपने हितों और सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताओं को सर्वोपरि रखेगा। इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच भविष्य की वार्ताओं को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।
इसी बीच क्षेत्रीय स्तर पर तनाव कम करने की कोशिशें भी जारी हैं। कतर की ओर से मध्यस्थता के प्रयास तेज किए गए हैं और दोनों देशों के बीच संवाद बहाल कराने के लिए कूटनीतिक संपर्क बनाए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि यह पहल सफल होती है तो पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम करने की दिशा में सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। हालांकि फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम दिखाई दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता अविश्वास केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में होने वाली वार्ताएं और दोनों देशों के राजनीतिक संकेत वैश्विक समुदाय की नजर में महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो तनाव कम होने की संभावना बनेगी, लेकिन आक्रामक बयानबाजी जारी रहने पर क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ सकती है।