सड़क किनारे किए गए सौंदर्यीकरण कार्य के तहत लगभग तीन फीट ऊंची लोहे की जाली लगाई गई है। इस रेलिंग के कारण राहगीरों का सीधे फुटपाथ पर पहुंचना मुश्किल हो गया है। कुछ चुनिंदा स्थानों पर प्रवेश और निकास के लिए कट पॉइंट बनाए गए हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश स्थानों पर ठेला संचालकों और अन्य अतिक्रमणकारियों ने कब्जा कर रखा है। परिणामस्वरूप पैदल चलने वाले लोगों को फुटपाथ का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
कई स्थानों पर स्थिति और भी विचित्र है। फुटपाथ के एक ओर तीन फीट ऊंची लोहे की रेलिंग है, जबकि दूसरी ओर पहले से बनी पक्की दीवार मौजूद है। ऐसे में पैदल यात्री बीच में फंसकर रह जाते हैं और उन्हें सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के नाम पर ऐसा डिजाइन तैयार किया गया है, जिसने मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर दिया है।
क्षेत्रवासियों ने सवाल उठाया है कि जब कोई भी सार्वजनिक परियोजना नागरिकों की सुविधा के लिए बनाई जाती है, तो उसकी डिजाइन और उपयोगिता का आकलन किए बिना मंजूरी कैसे दी जाती है। लोगों का कहना है कि बस या सार्वजनिक परिवहन से उतरने वाले यात्री सीधे फुटपाथ तक नहीं पहुंच सकते। इससे दुर्घटना की आशंका भी बढ़ जाती है। नागरिकों ने इसे सरकारी धन की बर्बादी और योजना निर्माण में गंभीर लापरवाही करार दिया है।
मामले के सामने आने के बाद नगर निगम के अधिकारियों ने भी संज्ञान लिया है। निगम के कार्यपालन यंत्री (ईई) एन.के. डेहरिया ने बताया कि संबंधित इंजीनियर से जानकारी मांगी गई है कि यह कार्य किस मद और किस प्रक्रिया के तहत स्वीकृत किया गया था। उन्होंने कहा कि यदि जांच में यह पाया जाता है कि फुटपाथ के उपयोग में लोगों को दिक्कत हो रही है तो आवश्यक बदलाव किए जाएंगे। उन्होंने स्वयं स्थल निरीक्षण करने की बात भी कही है।
वहीं वार्ड की पार्षद आरती अनेजा का कहना है कि क्षेत्र में अतिक्रमण और शराबियों के जमावड़े की समस्या को देखते हुए यह कदम उठाया गया था। ठेकेदार ने आश्वासन दिया था कि रेलिंग लगाने के बावजूद लोगों की आवाजाही प्रभावित नहीं होगी, लेकिन मौके पर पहुंचकर देखने पर स्थिति अलग मिली। पार्षद ने स्पष्ट किया कि यदि वर्तमान डिजाइन लोगों के लिए असुविधाजनक है तो इसमें बदलाव कराया जाएगा।
यह मामला एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि विकास कार्यों में तकनीकी योजना और जमीनी जरूरतों के बीच तालमेल कितना जरूरी है। यदि परियोजनाएं नागरिकों की सुविधा बढ़ाने के बजाय मुश्किलें खड़ी करने लगें, तो उनकी उपयोगिता पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।