नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों के बाद राज्य की राजनीति में एक अप्रत्याशित और नाटकीय मोड़ सामने आया है। कभी तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे मुखर आलोचक रहे आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) के संस्थापक हुमायूं कबीर ने अब संकट के समय उनके प्रति सहानुभूति दिखाई है। कबीर ने घोषणा की है कि यदि ममता बनर्जी चाहें तो वह अपनी नवनिर्वाचित रेजीनगर विधानसभा सीट से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं, ताकि बनर्जी वहां से उपचुनाव लड़कर राज्य विधानसभा में गरिमामय वापसी कर सकें।
यह राजनीतिक प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन के सबसे गंभीर दौर से गुजर रही हैं। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है और भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई है। इस हार के बाद टीएमसी के भीतर बड़े पैमाने पर आंतरिक विद्रोह हुआ है, जिससे पार्टी में बिखराव की स्थिति पैदा हो गई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपनी नंदीग्राम सीट खाली करते हुए भवानीपुर सीट अपने पास रखी है, जहां उन्होंने ममता बनर्जी को पराजित किया था। इस पराजय के बाद बनर्जी फिलहाल विधानसभा से बाहर हैं।
हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद जिले की दो विधानसभा सीटों, नौदा और रेजीनगर, दोनों से ऐतिहासिक जीत हासिल की है। चुनाव नियमों के अनुसार, उन्हें निर्धारित समय के भीतर इन दोनों में से किसी एक सीट से इस्तीफा देना होगा। कबीर ने संवाददाताओं से अनौपचारिक बातचीत में स्पष्ट कहा कि यदि ममता बनर्जी उनके पास आती हैं, तो वह रेजीनगर निर्वाचन क्षेत्र को उनके लिए खाली कर देंगे। उन्होंने राजनीतिक विश्लेषण साझा करते हुए दावा किया कि ममता बनर्जी अगर दोबारा नंदीग्राम से चुनाव लड़ती हैं, तो उनके जीतने की संभावना न के बराबर है, लेकिन रेजीनगर में उनके नेतृत्व में बनर्जी की जीत पूरी तरह सुनिश्चित की जा सकती है।
गौरतलब है कि हुमायूं कबीर को पिछले साल पार्टी नेतृत्व के साथ लंबे समय तक चले वैचारिक मतभेदों के कारण तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने आम जनता उन्नयन पार्टी का गठन किया और ममता बनर्जी सरकार की नीतियों पर जमकर प्रहार किया। कबीर ने वर्तमान स्थिति पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि आज दीदी जिस दौर से गुजर रही हैं, उसे देखकर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर पीड़ा होती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वह आज सार्वजनिक जीवन में जिस मुकाम पर हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं ममता बनर्जी का शुरुआती सहयोग रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम को मुर्शिदाबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के बीच कबीर के बढ़ते प्रभाव के रूप में भी देख रहे हैं। कबीर ने अपने प्रभाव को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही आज पूरे राज्य में ममता बनर्जी की बात का प्रभाव कम हो गया हो, परंतु रेजीनगर क्षेत्र में हुमायूं कबीर का निर्णय ही अंतिम और सर्वोपरि माना जाता है। टीएमसी में मची इस ऐतिहासिक बगावत के बीच पूर्व सहयोगियों द्वारा दी जा रही इस प्रकार की राजनीतिक जीवनदान की पेशकश बंगाल की भविष्य की राजनीति को एक नया आयाम दे सकती है।