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लेक सिटी नैनीताल की प्राकृतिक सुंदरता पर मंडरा रहा खतरा… NGT ने दी चेतावनी


नैनीताल।
उत्तराखंड (Uttarakhand) की सरोवर नगरी नैनीताल (Lake City Nainital) पर बढ़ते पर्यावरणीय खतरे को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal-NGT) ने बड़ा अलर्ट जारी किया है. मंगलवार को नैनीताल क्लब में आयोजित हाई लेवल समीक्षा बैठक में NGT के माननीय सदस्य और न्यायमूर्ति डॉ. अफरोज अहमद ने साफ शब्दों में कहा कि यदि नदी-नाले, प्राकृतिक जलस्रोत और जलधाराएं नहीं बचीं तो पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिकी को बचा पाना मुश्किल हो जाएगा.

बैठक में नैनीताल के सामने खड़ी कई गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई. इनमें नैनीझील का लगातार घटता जलस्तर, झील में बढ़ता प्रदूषण, कचरा प्रबंधन की समस्या, ड्रेनेज और सीवरेज नेटवर्क की स्थिति तथा जलस्रोतों पर बढ़ते अतिक्रमण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

बैठक के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि नैनीझील का जलस्तर लगातार प्रभावित हो रहा है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उन प्राकृतिक जलस्रोतों का कमजोर होना है जो सालों से झील को पानी उपलब्ध कराते रहे हैं. यदि समय रहते इन स्रोतों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है.


वॉटर बॉडी और वेटलैंड से हटेगा अतिक्रमण

अधिकारियों ने जानकारी दी कि नैनीताल शहर में कुल 13 वॉटर बॉडी और वेटलैंड मौजूद हैं. ये सभी बरसात के पानी को जमा करके धीरे-धीरे नैनीझील तक पहुंचाते हैं. यही जलस्रोत सर्दियों के मौसम में भी झील के जलस्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

हालांकि समय के साथ इन वॉटर बॉडी और वेटलैंड पर अतिक्रमण बढ़ गया है. कई स्थानों पर पानी का प्राकृतिक प्रवाह और भराव भी बाधित हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि नैनीझील का घटता जलस्तर इसी समस्या से जुड़ा हुआ है.

मामले की गंभीरता को देखते हुए NGT सदस्य सचिव ने कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत और जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल को सभी वॉटर बॉडी और वेटलैंड को अतिक्रमण मुक्त कराने के निर्देश दिए हैं. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस दिशा में विशेष अभियान चलाया जा सकता है.

बैठक में पर्यटन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों पर भी चर्चा की गई. अधिकारियों ने बताया कि पर्यटन सीजन के दौरान नैनीताल में लाखों लोग पहुंचते हैं. इससे शहर की अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है, लेकिन कचरे और प्रदूषण का दबाव भी कई गुना बढ़ जाता है. NGT ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि शहर में 100 प्रतिशत डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण सुनिश्चित किया जाए. साथ ही पर्यटन सीजन के लिए विशेष कचरा प्रबंधन योजना तैयार की जाए ताकि झील और आसपास के पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.


लाइट और ध्वनि प्रदूषण भी चिंता का विषय

बैठक में कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने लाइट पॉल्यूशन और ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा भी उठाया. विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक कृत्रिम रोशनी और लगातार बढ़ता शोर वन्यजीवों, पक्षियों और पहाड़ की प्राकृतिक जीवनशैली पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है. इसलिए इन दोनों समस्याओं पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत बताई गई.


कचरा निस्तारण को लेकर तैयारी

अधिकारियों ने बताया कि जिले के नगरीय क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग 230 मीट्रिक टन कूड़ा गोलापार ट्रंचिंग ग्राउंड भेजा जा रहा है. वहां जल्द ही आधुनिक कचरा निस्तारण मशीन स्थापित की जाएगी. इसके अलावा पुराने कूड़े के बड़े हिस्से का निस्तारण भी किया जा चुका है.


सिर्फ सरकार नहीं, जनता की भी जिम्मेदारी

बैठक के अंत में डॉ. अफरोज अहमद ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण सिर्फ सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है. इसके लिए आम लोगों की भागीदारी और जागरूकता सबसे अधिक जरूरी है. उन्होंने कहा कि यह केवल नैनीताल की खूबसूरती बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा मुद्दा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पहाड़ों के जलस्रोत सूख गए, झीलें प्रदूषित हो गईं और जंगलों को नुकसान पहुंचा तो आने वाले समय में पहाड़ों की पहचान और प्राकृतिक विरासत दोनों पर संकट गहरा सकता है. इसी वजह से NGT ने प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया है.

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