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चाबहार पर पाकिस्तान की नजर, ग्वादर के साथ ‘सिस्टर पोर्ट’ योजना ने बढ़ाई भारत की चिंता, रणनीतिक समीकरण बदलने की आशंका

नई दिल्ली । ईरान के चाबहार बंदरगाह को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के साथ जोड़कर ‘सिस्टर पोर्ट’ के रूप में विकसित करने की चर्चा ने क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस प्रस्ताव को ऐसे समय में सामने रखा गया है जब चाबहार परियोजना में भारत की भूमिका और भविष्य को लेकर कई तरह की चर्चाएं जारी हैं। रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि इस दिशा में कोई ठोस प्रगति होती है तो इसका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और समुद्री सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

पाकिस्तान के कुछ विश्लेषकों द्वारा प्रस्तुत इस विचार में चाबहार और ग्वादर के बीच आर्थिक एवं लॉजिस्टिक सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। प्रस्ताव के अनुसार दोनों बंदरगाहों के बीच परिवहन, कस्टम प्रक्रियाओं और व्यापारिक गतिविधियों को एकीकृत कर बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया जा सकता है। ग्वादर पहले से ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जबकि चाबहार को भारत ने अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के वैकल्पिक मार्ग के रूप में विकसित करने में निवेश किया है।

चाबहार बंदरगाह भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक परियोजनाओं में शामिल रहा है। यह बंदरगाह पाकिस्तान को बाईपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक व्यापारिक पहुंच प्रदान करता है। यही कारण है कि इसे केवल आर्थिक परियोजना नहीं बल्कि भारत की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण आधार माना जाता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों ने इस परियोजना के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण चाबहार परियोजना की गति प्रभावित हुई है। इसी बीच यह भी चर्चा रही कि भारत अपनी कुछ हिस्सेदारी और संचालन व्यवस्था को लेकर वैकल्पिक विकल्पों पर विचार कर रहा है ताकि परियोजना पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। हालांकि भारत ने चाबहार को लेकर अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को कई बार दोहराया है।

रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में चाबहार और ग्वादर के बीच किसी प्रकार का औपचारिक सहयोग विकसित होता है तो इससे क्षेत्र में चीन, पाकिस्तान और ईरान के बीच सहयोग का नया आयाम उभर सकता है। ऐसे परिदृश्य में भारत की समुद्री रणनीति और पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में उसकी उपस्थिति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखने के लिए भारत को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी पड़ सकती है।

जानकारों के अनुसार मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में बंदरगाह केवल व्यापारिक केंद्र नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सामरिक और कूटनीतिक महत्व के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में उनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसी कारण चाबहार और ग्वादर से जुड़ी हर गतिविधि पर क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों की नजर बनी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए आने वाले वर्षों में चाबहार परियोजना का महत्व कम नहीं होगा। मध्य एशिया, रूस और पश्चिम एशिया के साथ संपर्क बढ़ाने की रणनीति में यह बंदरगाह अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ऐसे में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच भारत के लिए अपनी आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक प्राथमिकताओं के अनुरूप संतुलित और सक्रिय नीति अपनाना आवश्यक होगा।

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