उन्होंने अपने संदेश में कहा कि संत त्यागराज ने भक्ति और संगीत को जिस तरह एक साथ पिरोया, वह भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में अद्वितीय है। उनकी रचनाएं केवल संगीत नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का माध्यम भी हैं। माना जाता है कि उन्होंने हजारों कृतियों की रचना की थी, जिनमें से आज केवल सीमित रचनाएं ही उपलब्ध हैं, जो इस विरासत के संरक्षण की आवश्यकता को और भी महत्वपूर्ण बनाती हैं।
पवन कल्याण ने इस बात पर चिंता जताई कि इतनी समृद्ध संगीत परंपरा के बावजूद कई रचनाएं समय के साथ विलुप्त होती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल एक कलाकार या समुदाय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का कर्तव्य है कि इस धरोहर को सुरक्षित रखा जाए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि त्यागराज की रचनाओं ने न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर संगीत प्रेमियों को प्रभावित किया है। उनकी भक्ति आधारित रचनाएं आज भी संगीतकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। कई महान कलाकारों ने उनकी कृतियों को मंच पर प्रस्तुत कर इसे वैश्विक पहचान दिलाई है।
इस अवसर पर उन्होंने दो महत्वपूर्ण सुझाव भी सामने रखे। पहला सुझाव यह है कि आंध्र प्रदेश में एक राज्य स्तरीय त्यागराज आराधना उत्सव का आयोजन किया जाए, जिसमें देश-विदेश के कलाकारों और विद्वानों को शामिल किया जाए ताकि इस परंपरा को और मजबूती मिले। दूसरा सुझाव यह है कि उनकी सभी उपलब्ध रचनाओं, पांडुलिपियों और मौखिक परंपराओं का डिजिटल संरक्षण किया जाए ताकि यह ज्ञान आधुनिक तकनीक के माध्यम से सुरक्षित रह सके।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार, सांस्कृतिक संस्थान और समाज मिलकर प्रयास करें, तो इस अमूल्य धरोहर को न केवल संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक और अधिक प्रभावी तरीके से पहुंचाया जा सकता है।
यह अवसर केवल एक जयंती नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की उस परंपरा को याद करने और उसे भविष्य के लिए सुरक्षित करने का संकल्प लेने का अवसर बन गया है, जिसे संत त्यागराज ने अपनी साधना और भक्ति से समृद्ध किया था।