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नेपाल में नई सत्ता पर सवाल, छात्र राजनीति पर प्रतिबंध और सीमा शुल्क, नीति से जनता में असंतोष


नई दिल्ली । नेपाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में पहुंचती दिखाई दे रही है जहां नई सरकार बनने के बाद ही असंतोष और विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। राजधानी काठमांडू में राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और सरकार के हालिया फैसलों ने जनता के बीच बहस और नाराजगी दोनों बढ़ा दी हैं।

केपी ओली सरकार के पतन के बाद हुए संसदीय चुनावों में युवाओं के समर्थन से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेतृत्व में नई सरकार बनी थी। इस सरकार का नेतृत्व बालेंद्र शाह कर रहे हैं जिन्हें जनरेशन-जेड आंदोलन के समर्थन से सत्ता मिली थी। शुरुआत में इसे बदलाव की बड़ी उम्मीद के रूप में देखा गया था लेकिन कुछ ही समय में स्थिति बदलती नजर आने लगी है।

नई सरकार के गठन के बाद से ही राजनीतिक अस्थिरता के संकेत मिलने लगे जब दो मंत्रियों के इस्तीफे ने प्रशासनिक स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए। गृह मंत्री पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप और श्रमिक मंत्री पर अनुशासनहीनता के कारण सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा।

इस बीच सितंबर 2025 में हुए जनरेशन-जेड आंदोलन ने नेपाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था। यह आंदोलन भ्रष्टाचार महंगाई बेरोजगारी और सोशल मीडिया प्रतिबंध जैसे मुद्दों के खिलाफ शुरू हुआ था जो बाद में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन में बदल गया। इसी आंदोलन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ था।

लेकिन अब वही युवा वर्ग सरकार के कुछ फैसलों से असंतुष्ट नजर आ रहा है। हाल ही में नेपाल सरकार ने नेपाल और भारत की सीमा पर कस्टम ड्यूटी लगाने का निर्णय लिया है जिसके तहत 100 नेपाली रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर शुल्क लागू किया गया है। इस फैसले का सीमावर्ती इलाकों में व्यापक विरोध हो रहा है क्योंकि वहां के लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं।

इसके अलावा सरकार द्वारा छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय भी बड़ा विवाद बन गया है। राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों को सीमित करने या बंद करने के कदम ने कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भारी विरोध को जन्म दिया है। हजारों छात्र सड़कों पर उतरकर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहे हैं।

छात्र नेताओं का कहना है कि सरकार को बातचीत और सुधार के जरिए समाधान निकालना चाहिए था न कि सीधे प्रतिबंध लगाकर युवाओं की आवाज को दबाना चाहिए। इसी कारण कई शैक्षणिक संस्थानों में प्रदर्शन और हड़ताल की स्थिति बन गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार ने जल्द ही इन विवादित फैसलों पर पुनर्विचार नहीं किया तो राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन और बढ़ सकते हैं जिससे देश की स्थिति फिर से पिछले आंदोलनों की तरह तनावपूर्ण हो सकती है। फिलहाल नेपाल की राजनीति एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है जहां एक तरफ बदलाव की उम्मीद है और दूसरी तरफ बढ़ता जनअसंतोष सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

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