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अमेरिका की शुल्क नीति पर उठे सवाल, विशेषज्ञों ने भारत-चीन-रूस समीकरण को बताया उभरती चुनौती

नई दिल्ली। वैश्विक राजनीति और व्यापारिक संबंधों में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका की टैरिफ नीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल के वर्षों में अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनाई गई संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। इसी क्रम में यह तर्क सामने आ रहा है कि अमेरिका द्वारा भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की रणनीति अनजाने में उन देशों को एक-दूसरे के करीब ला सकती है, जिन्हें अब तक कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धी या विरोधी माना जाता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक शक्ति संतुलन के इस दौर में आर्थिक दबाव की नीतियां कभी-कभी ऐसे परिणाम भी पैदा कर देती हैं, जिनकी पहले कल्पना नहीं की गई होती।

अमेरिका की ओर से विभिन्न देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में नई चिंताएं पैदा की हैं। भारत और चीन दोनों दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में यदि दोनों देशों को समान प्रकार के आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है, तो उनके बीच व्यापारिक सहयोग और संवाद बढ़ने की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सहित कई जटिल मुद्दे मौजूद हैं, फिर भी आर्थिक हितों के आधार पर सहयोग की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

पिछले कुछ समय में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत, चीन और रूस की सक्रिय भागीदारी ने भी वैश्विक रणनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ती दुनिया में क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां अपने-अपने हितों के आधार पर नए साझेदारी मॉडल तलाश रही हैं। इसी संदर्भ में रूस-भारत-चीन (RIC) समूह को लेकर भी चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह मंच किसी बड़े रणनीतिक गठबंधन का रूप ले लेगा, लेकिन तीनों देशों के बीच संवाद और सहयोग के कुछ क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ी हैं।

दूसरी ओर, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सक्रिय क्वाड (QUAD) समूह को लेकर भी विभिन्न प्रकार के आकलन सामने आते रहते हैं। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस समूह का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना बताया जाता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है और वह किसी भी मंच को किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि भारत एक तरफ क्वाड में सक्रिय रहता है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स, एससीओ और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी अपनी भूमिका निभाता है।

सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर भी वैश्विक स्तर पर नजरें टिकी हुई हैं। ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वित्तीय सहयोग और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों जैसे विषयों पर चर्चा लंबे समय से होती रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सदस्य देश आपसी आर्थिक सहयोग को और मजबूत करते हैं तो इससे डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली की प्रमुख मुद्रा बना हुआ है और निकट भविष्य में उसकी स्थिति में किसी बड़े बदलाव की संभावना सीमित मानी जाती है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि वर्तमान दौर में किसी भी वैश्विक शक्ति के लिए केवल आर्थिक दबाव के जरिए अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को लागू करना आसान नहीं रह गया है। दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग मंचों पर सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों करते हैं। भारत भी इसी संतुलित दृष्टिकोण का पालन करता रहा है, जिसमें अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ संबंधों को समान महत्व दिया जाता है।

फिलहाल यह स्पष्ट है कि वैश्विक व्यापार युद्ध, टैरिफ नीतियां और बदलते भू-राजनीतिक समीकरण आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करते रहेंगे। भारत, चीन और रूस के बीच बढ़ता संवाद, ब्रिक्स की सक्रियता और क्वाड की भूमिका जैसे विषय भविष्य की वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहेंगे। हालांकि इन सभी संभावनाओं का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में देशों के ठोस कदमों और नीतिगत निर्णयों पर निर्भर करेगा।

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