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रुपये को संभालने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना आत्मघाती: टैक्स नियमों में सुधार ही असली इलाज


जनक राज जनक राज

तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा बाजार में भारी बिकवाली से रुपया दबाव में आ गया है। रुपये की गिरती साख के बीच मीडिया में यह सुझाव आता रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को ब्याज दरें बढ़ाकर भारतीय मुद्रा संभालनी चाहिए।

इस सुझाव के पीछे मुख्य तर्क यह है कि ब्याज दरें ऊंची रहने से उधार लेना अधिक महंगा हो जाता है जिससे सट्टेबाजी कम हो जाती है और विदेशी निवेश लाने में आसानी होती है। ब्याज दर का इस्तेमाल आरबीआई मूल्य स्थिरता का लक्ष्य हासिल करने के लिए करता है। मशहूर टिनबर्गेन सिद्धांत के मुताबिक एक साधन का इस्तेमाल केवल एक लक्ष्य हासिल करने के लिए जाना चाहिए। विनिमय दर नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल बाजारों में भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है और मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की विश्वसनीयता को चोट पहुंचा सकता है।

दूसरा बात, यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ब्याज दर बढ़ाने से रुपये में गिरावट थम जाएगी। वर्ष 2013 में ‘टेपर टैंट्रम’ के दौरान (जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने घोषणा की कि वह भविष्य में नरमी के कदमों को वापस लेगा) तब ब्याज दर से बचाव रुपये को स्थिर नहीं कर पाया था।

बाजार में सुधार अन्य उपायों से दिखा, खासकर बैंकों के लिए आरबीआई की रियायती विदेशी मुद्रा अप्रवासी (बैंक) जमा स्वैप विंडो के जरिये जुटाई गई 34 अरब डॉलर रकम से काफी मदद मिली थी।

इस बात के कई ठोस सबूत हैं कि ब्याज दरों के जरिये विनिमय दर नियंत्रित करना शायद ही कभी कारगर होता है। अपवाद के तौर पर गंभीर आर्थिक संकट के दौरान ऐसा किया जा सकता है मगर तब भी ब्याज दरों में बहुत अधिक वृद्धि की जरूरत होती है। भारत में ऐसे हालात अभी नहीं हैं। रुपये पर दबाव मुख्य रूप से तेल की बढ़ती कीमतों के कारण है जिससे चालू खाता घाटा बढ़ रहा है जबकि विदेशी निवेश (एफपीआई) निकलने से रकम की उपलब्धता कम हो रही है।

नीतिगत दरों के माध्यम से विनिमय दर नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति समिति को इसमें भारी भरकम बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है जिससे वास्तविक अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा। मुद्रा की कमजोरी का मुकाबला करने के लिए ब्याज दरों के इस्तेमाल के गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं। यही कारण है कि दुनिया के ज्यादातर केंद्रीय बैंक इस उपाय का इस्तेमाल करने से हिचकते हैं और ऐसा करते भी हैं तो सतर्क रहते हैं।

नीतिगत दर मुद्रास्फीति नियंत्रण का एक माध्यम है। चूंकि, विनिमय दर में गिरावट मुद्रास्फीति को प्रभावित करती है इसलिए नीतिगत दर तभी बढ़ाई जानी चाहिए जब मुद्रास्फीति लक्ष्य से अधिक हो जाए। मौजूदा हालात 2018 जैसे ही हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक नीति के सामान्यीकरण और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण चालू खाता घाटा बढ़ने से विदेशी रकम निकलने लगी जिससे रुपया दबाव में आ गया। तब भी मीडिया में कुछ लोगों ने रुपये की गिरावट रोकने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की वकालत की थी।

ऐसी अटकल थी कि एमपीसी सितंबर 2018 में निर्धारित बैठक के दौरान दरें बढ़ाने का फैसला लेगी। हालांकि, कारोबारियों को तब निराशा हाथ लगी जब एमपीसी ने अपनी निर्धारित अक्टूबर की बैठक में दरें अपरिवर्तित रखीं। इसके बाद अगले तीन दिनों में रुपये में एक फीसदी की भारी गिरावट आई क्योंकि यह स्पष्ट हो गया कि एमपीसी विनिमय दर बनाए रखने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल नहीं करेगी।

खास बात यह है कि विदेशी निवेशकों ने ज्यादातर शेयरों से अपनी रकम निकाली है। चूंकि, ब्याज दरों में बढ़ोतरी से आम तौर पर शेयरों का मूल्यांकन कम हो जाता है और कंपनियों के लिए पूंजी की लागत बढ़ जाती है इसलिए रुपया संभालने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल बिकवाली रोकने के बजाय उसे और बढ़ा सकता है।

रुपये पर दबाव तो साफ दिख रहा है। हालांकि, इसे बचाने के लिए नीतिगत रीपो दर का उपयोग करने से मौद्रिक नीति का विनिमय दर प्रबंधन के साथ घालमेल हो जाता है। असली चुनौती ऐसे उपाय लागू करना है जो एफपीआई निकासी पर अंकुश लगाए और पूंजी वापस लाने के लिए माहौल दोबारा बनाए।

एफपीआई 2025 और 2026 में लगातार शुद्ध बिकवाल रहे। एफपीआई ने वर्ष 2025 में लगभग 19 अरब डॉलर और 2026 में अब तक 24 अरब डॉलर की बिकवाली की है। फरवरी को छोड़कर इस साल हर महीने एफपीआई शुद्ध बिकवाल रहे हैं।

इस संदर्भ में यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि विदेशी निवेशक भारत से पैसा क्यों निकाल रहे हैं। अमेरिका बॉन्ड पर अब 4.6 फीसदी से अधिक रिटर्न मिल रहा है और रुपये पर भारी दबाव है। इसे देखते हुए विदेशी निवेशकों को भारतीय परिसंपत्तियों से बहुत ज़्यादा रिटर्न की जरूरत होती है, ताकि वे डॉलर के हिसाब से उतना ही कमा सकें जितना वे कहीं और कमा सकते हैं। वैश्विक जोखिम लेने की प्रवृत्ति कम होने पर भारत के प्रति उनका झुकाव कम हो जाता है।

एक प्रमुख कारण भारत में पूंजीगत लाभ कर है। विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों से अल्पकालिक लाभ पर 20 फीसदी और दीर्घकालिक लाभ पर 12.5 फीसदी कर का भुगतान करते हैं। दूसरी तरफ सिंगापुर, हॉन्ग कॉन्ग, मलेशिया और थाईलैंड जैसे प्रतिस्पर्द्धी बाजार विदेशी निवेशकों के पूंजीगत लाभ पर कोई कर नहीं लगाते हैं।

कमजोर रुपया और अमेरिका में ऊंची दरों के कारण रिटर्न पहले से ही दबाव में हैं और उस पर करों में यह अंतर विदेशी निवेशकों को भारत के बजाय दूसरे अधिक कर अनुकूल देशों की तरफ धकेल देता है।

घरेलू निवेशकों ने विदेशी निवेशकों द्वारा भारी बिकवाली के दबाव से शेयर बाजार को सहारा दिया है। हालांकि, आरबीआई के हस्तक्षेप के बावजूद रुपये में पांच महीनों में 5.4 फीसदी की गिरावट आई है और यह नए निचले स्तर पर पहुंच गया है। यह एक दुष्चक्र है। रुपये के और अधिक कमजोर होने की आशंका से विदेशी निवेशक (एफपीआई) अधिक बिकवाली करने लगते हैं जिससे रुपया और कमजोर हो जाता है।

यह पूरा चक्र काफी चिंता की बात है, साथ ही कमजोर रुपये से तेल एवं दूसरी वस्तुओं के आयात पर लागत बढ़ने से मुद्रास्फीति भी बढ़ती है। इसे रोकने के लिए पूंजी निकासी थामने के उपायों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इसका एक विकल्प पूंजीगत लाभ कर युक्तिसंगत बनाना हो सकता है। करोपरांत ऊंचे रिटर्न से भारत के प्रति एफपीआई की जोखिम-रिटर्न धारणा में सुधार होगा।

स्थिर रुपया एफपीआई द्वारा मांगे जाने वाले मुद्रा-जोखिम प्रीमियम को भी कम करता है जिससे अपेक्षित रिटर्न और मुद्रास्फीति जोखिम दोनों कम हो जाते हैं। पूंजी आकर्षित करने के लिए अन्य उपायों पर भी अमल करना होगा। एक बार रुपया स्थिर होने पर मौजूदा मूल्यांकन और कम मुद्रा जोखिम एफपीआई को वापस लाने में मदद कर सकते हैं।

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